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    गजब : बिहार का एक ऐसा गांव, जहां नहीं रहते कोई पुरुष, जानते हैं आप महाल‍िया के महाराज की कहानी?

    By Dilip Kumar ShuklaEdited By:
    Updated: Mon, 19 Sep 2022 01:56 PM (IST)

    गजब बिहार के बांका में एक ऐसा गांव है जहां के पुरुष गांव में नहीं रहते हैं। महोलिया के महाराज कोलकाता की रसोई बनाते हैं। उनके बिना पूरा नहीं होता कोल ...और पढ़ें

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    Amazing : बांका के एक गांव की कहानी।

    जागरण संवाददाता, बांका। गजब : कटोरिया-बांका रोड में सड़क किनारे ही एक बस्ती है महोलिया। इस गांव में ढूंढे आपको कोई पुरुष सदस्य नहीं मिलेगा। सामान्य दिनों में जाने पर गांव में बच्चे और महिलाओं के सिवा किसी का दर्शन नहीं होगा। एकाध बुजुर्ग गांव में दिख जाएंगे। दरअसल, पूरा महोलिया गांव साल भर रोजी-रोटी के लिए कोलकाता में रहता है। सभी कोलकाता की रसोई महकाते हैं। कोलकाता शहरी आबादी में बंगाली मोसाय का कोई भी भोज-भंडारा महोलिया के महराजों के बिना नहीं होता है।

    कोलकाता में गांव के सभी कारीगर महाराज ही कहलाते हैं। बकायदा सबने अपने नाम में भी महराज उपनाम जोड़ लिया है। करीब 45 घर वाले इस बस्ती का करीब 100 सदस्य कोलकाता में रसोई बनाता है। अब कई महाराजों ने कोलकाता में अपना घर तक खरीद लिया है। उसी में सभी सदस्यों का डेरा है। फिर आर्डर के मुताबिक, वे सभी मुहल्लों में जाकर भोजन बनाने का काम करते हैं। अभी बड़े महाराज में गिने जा रहे घनश्याम महाराज, सुखेदव महाराज, माधो महराज आदि ने बताया कि महोलिया में महराजों का काम पिछली पीढ़ी से ही हो रहा है। पहले एक-दो लोग कोलकाता में जाकर बंगाली परिवारों में रसोई बनाते थे। उनके इलाके में दूसरा कोई काम-धंधा या खेती किसानी नहीं होने से पूरे गांव को महाराजी रास आ गई। एक-एक कर सभी कोलकाता जाकर साथ रहकर महराजी सीख गए। अब पूरा गांव कोलकाता की इसी महराजी से चल रहा है।

    उन्होंने बताया कि जीने के लिए कोई ना कोई काम तो करना था। रसोई बनाना उनकी जाति का पेशा नहीं है। मगर इसने सभी परिवारों को रोटी उपलब्ध कराया तो अब हम दूसरी तरफ क्यों देखेंगे। घनश्याम महाराज ने बताया कि सबका परिवार गांव में रहता है। कोलकाता में हर महाराज को 10 से 20 हजार रुपया तक कमाई हो जाती है। रोजगार ऐसा है कि इसमें खाना-पीना की चिंता है नहीं। जिसका इस काम में जितना अनुभव होता है और जितना बढ़िया खाना बनाता है, उसकी मजदूरी बढ़ती जाती है। जिन तीन-चार लोगों ने कोलकाता में घर खरीद लिया, पूरा गांव में उसी में साथ रहते हैं। सभी कारीगरों के आसपास रहने के कारण परदेश में रहने का भाव नहीं दिखता है। एक महीने ही काम थोड़ा कम मिलता, बाकी महीने काम की कमी नहीं रहती है।