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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 07, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

राखी बांधने के बाद मांग लिया गांव तो चल पडी राखी न मनाने की परंपरा

By Dharmendra PandeyEdited By:
Published: Mon, 07 Aug 2017 01:05 PM (IST)Updated: Mon, 07 Aug 2017 08:22 PM (IST)

उत्तर प्रदेश के संभल जिले के बेनीपुर चक गांव में सदियों ने भाइयों की कलाइयां सूनी पड़ी हैं। यहां रक्षाबंधन ...और पढ़ें

राखी बांधने के बाद मांग लिया गांव तो चल पडी राखी न मनाने की परंपरा
राखी बांधने के बाद मांग लिया गांव तो चल पडी राखी न मनाने की परंपरा

संभल (जेएनएन)। रक्षाबंधन का त्यौहार देश में परंपरागत ढंग से मनाया जाता है। यह एक ऐसा त्यौहार है, जहां पर लोग धर्म, जाति व संप्रदाय को किनारे कर धूमधाम से मनाते हैं। इसके इतर उत्तर प्रदेश में एक ऐसा गांव है जहां पर लोग डर के कारण सदियों से रक्षाबंधन नहीं मनाते हैं। 

उत्तर प्रदेश के संभल जिले के बेनीपुर चक गांव में सदियों ने भाइयों की कलाइयां सूनी पड़ी हैं। यहां पर रक्षाबंधन पर राखी नहीं बांधी जाती है। यहां पर रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया जाता है। यहां पर लोग राखी इसलिए नहीं बंधवाते क्योंकि उन्हें डर है कि बहन उससे कहीं ऐसा उपहार न मांग ले, जिससे उससे अपना घर छोडऩा पड़ जाए। रक्षाबंधन के दिन इस गांव के हर घर में सन्नाटा पसरा रहता हैं।

रक्षाबंधन पर हर बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर बदले में रक्षा का वचन मांगती हैं। स्नेह से भरा भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक यह पर्व सम्भल जिले के गांव में नहीं मनाया जाता है। वर्तमान समय में भाई बहन चाहते हैं कि वह बंधवाएं लेकिन पूर्वजों की परंपरा को तोड़ना भी नहीं चाहते हैं। 

तहसील क्षेत्र में सम्भल से पांच किलोमीटर दूर आदमपुर मार्ग पर स्थित बैनीपुर गांव के ही 70 वर्षीय बुजुर्ग सौदान सिंह बताते हैं कि उनके पूर्वज अलीगढ़ जिले के अतरौली तहसील क्षेत्र के सेमरई गांव के निवासी थे। यहां यादव जमींदार थे इस गांव में ठाकुर परिवार भी रहता था। ठाकुर के परिवार में कोई बेटा नहीं होने के कारण उनकी बेटियां यादवों के बेटों की कलाई पर राखी बांधती थीं। एक बार रक्षाबंधन पर ठाकुर की बेटी ने यादवों से राखी के बदले उपहार में गांव की जमींदारी मांग ली।

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उसी दिन यादव परिवार ने गांव को छोड़ दिया। हालांकि बाद में ठाकुरों ने काफी समझाने का प्रयास किया था लेकिन यादव गांव को छोड़कर सम्भल के बैनीपुर गांव में आकर बस गये। मेहर व बकिया गोत्र के कुछ यादव महोरा, बरवाली मढ़ैया, कटौनी व अजीमाबाद में भी रहते हैं जो राखी नहीं बंधवाते हैं। वर्तमान समय में बहनें अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधना चाहती हैं भाई भी राखी बंधवाना चाहते हैं लेकिन पूर्वजों की परंपरा के कारण वह बेबस हैं।

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बात के धनी जमींदार अपनी मुंहबोली बहन को रक्षाबंधन के दिन ही गांव व उसकी जमींदारी देकर खुद गांव से निकल गए। हालांकि बाद में ठाकुर बहन ने बहुत कहा यह तो मजाक था लेकिन यादव परिवार ने कहा कि हमारे यहां बहनों से मजाक की परंपरा नहीं है, जो दे दिया, सो दे दिया। वह जमीदार यादव परिवार संभल के बेनीपुर गांव पहुंचकर बस गए। उस दिन के बाद इन यादव परिवारों ने बहनों से राखियां बंधवाना इसलिए छोड़ दिया, कि कहीं दोबारा कोई बहन उन्हें अपना घर छोडऩे पर मजबूर न कर दे। इस गांव में तभी से राखी न बंधवाने की परंपरा कायम है। 

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क्या कहते हैं युवा-

बैनीपुर गांव निवासी अमरपाल यादव व हरकेश सिंह कहते हैं कि कालेज या अन्य जगहों पर साथियों के हाथों में राखी देख मन तो करता है कि राखी बंधवाएं लेकिन पूर्वजों की परंपरा कायम रहे। इसलिए राखी नहीं बंधवाते।

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वहीं सोनिया, विमलेश, पूजा व काॅपी कहती हैं कि चाची, भाभी रक्षाबंधन पर अपने मायके जाकर राखी बांधती हैं उन्हें देखकर वह भी चाहती हैं कि वह अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर जीवनभर रक्षा का वचन लें लेकिन घर के बड़े बुजुर्गों की परंपरा बताकर मना कर देते हैं।