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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 31, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

रामपुर में महादेव के इस मंदिर में मुस्लिम भी करते हैं प्रसाद ग्रहण

By amal chowdhuryEdited By:
Published: Mon, 31 Jul 2017 10:50 AM (IST)

रामपुर के तत्कालीन नवाब अहमद अली खां को जब यहां शिविलंग होने की जानकारी हुई तो उन्होंने इसके बारे में ...और पढ़ें

रामपुर में महादेव के इस मंदिर में मुस्लिम भी करते हैं प्रसाद ग्रहण
रामपुर में महादेव के इस मंदिर में मुस्लिम भी करते हैं प्रसाद ग्रहण

रामपुर (संजीव शर्मा)। सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल देखने को मिलती है श्री पातालेश्वर महादेव शिव मंदिर भमरौआ में। जहां हिंदू ही नहीं मुस्लिम भी दर्शन करने आते हैं, प्रसाद चढ़वाते हैं और भंडारा ग्रहण करते हैं। मुस्लिम आबादी के बीच बने इस मंदिर का निर्माण करीब 200 साल पहले रामपुर के तत्कालीन नवाब ने करवाया था। मंदिर की मान्यता भी बड़ी है।

सावन माह में लाखों श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना करने आते हैं और जलाभिषेक करते हैं। मंदिर के पुजारी पंडित नरेश कुमार शर्मा बताते हैं कि मुस्लिम भी मंदिर में आते हैं। वे हमें प्रसाद देकर कहते हैं कि यह हमारी तरफ से चढ़ा देना। जिस पर हम उनका प्रसाद भगवान भोलेनाथ को चढ़ाकर उन्हें वापस कर देते हैं। मंदिर में मुसलमान भी भंडारा खाते हैं और वे यहां लगने वाले मेले में सहयोग करते हैं।

गांव के मुहम्मद अली का कहना है कि मंदिर में ज्यादातर समय भंडारे होते हैं। हम भी निसंकोच भंडारे में प्रसाद ग्रहण करते हैं। एक अन्य मुस्लिम भूरा का कहना है कि मंदिर की मान्यता बहुत है। हमारा काम फेरी लगाने का है, जिसके कारण हमें कई गांवों में जाना होता है।

कई बार आस-पास के गांव के लोगों को जब पता चलता है कि हम भमरौआ गांव के रहने वाले हैं, तो वे हम से ही कह देते हैं कि किसी कारणवश मंदिर नहीं जा पा रहे, आप हमारी ओर से मंदिर में प्रसाद चढ़वा देना। हमने कई बार मंदिर के पुजारी से उनका प्रसाद चढ़वाया है।

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मंदिर का इतिहास: मंदिर के पुजारी पंडित नरेश कुमार शर्मा ने बताया कि ग्राम भमरौआ में मंदिर के स्थान पर पहले बंजर भूमि थी। सन 1788 में लोगों को महादेव शिवलिंग का पता चला। रामपुर के तत्कालीन नवाब अहमद अली खां को जानकारी हुई तो उन्होंने इसके बारे में पंडितों से राय ली और यहां पर मंदिर बनवाने की योजना तैयार की। 1822 में मंदिर बनवाकर पंडित दयाल दास को इसकी जिम्मेदारी सौंपी।

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