यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 26, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
रेल बजटः कुछ चिंता की लकीरें तो कुछ उम्मीद की सुनहरी किरणें
प्रभु सुधारों के समर्थक माने जाते हैं। सफाई, बुजुर्गो की सुविधा और महिलाओं की सुरक्षा तक उन्होंने हर क्षेत्र में ...और पढ़ें

नई दिल्ली [आरके सिंह, पूर्व अध्यक्ष रेलवे बोर्ड]। कुछ चिंता की लकीरें तो कुछ उम्मीद की सुनहरी किरणें। सुरेश प्रभु के दूसरे रेल बजट की यही तस्वीर है। प्रभु सुधारों के समर्थक माने जाते हैं। सफाई, बुजुर्गो की सुविधा और महिलाओं की सुरक्षा तक उन्होंने हर क्षेत्र में यात्रियों को कुछ न कुछ अछा अहसास देने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें यह भी देखना होगा कि यात्रियों की संख्या क्यों घट रही है? किराये और माल भाड़े के रूप में रेलवे ने जितनी कमाई का आकलन किया था उसमें 8.5 से 10 फीसद की कमी रहना मामूली बात नहीं है। इसका अर्थ है कि हमारी रेल प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रही है।
आमदनी में गिरावट के दो कारण गिनाए जा सकते हैं। अर्थव्यवस्था में ठहराव और पिछली बार माल भाड़े में वृद्धि के कारण गुड्स ट्रैफिक का एक हिस्सा सड़क की राह चला गया। यात्री किराये में अनुमानित राजस्व लक्ष्य पूरा न होने के लिए कचे तेल की कीमतों में गिरावट को वजह बताया जा सकता है। यह माना जा रहा है कि विमान किराये में कमी से रेलयात्रियों ने हवाई जहाज की ओर रुख कर लिया है। यह सही हो सकता है, क्योंकि जैसी भीड़ कभी रेलवे प्लेटफार्माें में दिखती थी वैसा ही कुछ हवाई अड्डों में दिखने लगा है।
हकीकत जो भी हो, इन दोनों ही मामलों ने रेलवे को चुनौतियों का अहसास तो करा ही दिया है। क्या रेलवे एयरलाइन कंपनियों की तरह प्रतिस्पर्धी बनने को तैयार है? क्या वह टाइमिंग से लेकर प्लेटफार्म और वेटिंग एरिया तक यात्रियों को एयरलाइंस जैसी सुविधाएं दे सकती है? अगर माल ढुलाई के मोर्चे पर रेलवे लक्ष्य से पीछे रह जाती है तो विकास के सपने को साकार करना और मुश्किल होगा। रेलवे की दो तिहाई आमदनी माल ढुलाई से आती है। यात्रियों के किराये का घाटा भी इससे ही भरता है। बड़ा सवाल यह भी है कि रेलवे नए साल में ऑपरेशनल रेशियो 92 फीसद पर कैसे ले जा पाएगी? जब पिछली बार 90 फीसद के रेशियो को नहीं हासिल किया जा सका। इस बार तो सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का बोझ भी होगा।
प्रभु का सपना रेल यात्र की गुणवत्ता में सुधार करना है। उनके पास कई कार्यक्रम हैं-एफएम चैनल से लेकर तेजस ट्रेनें तक, लेकिन सारा दारोमदार कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर है। उन्हें यह भी देखना होगा कि रेलवे की आंतरिक संसाधन जुटाने की क्षमता क्यों घट रही है? डीआरएफ का आवंटन 7900 से 5500 करोड़ पर आना ठीक बात नहीं है। यह अछी बात है कि रेलवे ने इस बजट में निवेश को सवा लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया। वह कुल मिलाकर एक लाख 71 हजार करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है। रेलवे का विस्तार वर्षो से नहीं हो रहा था, लेकिन अब चीजें बदल रही हैं। प्रभु को निगरानी के स्तर में कमी नहीं आने देनी होगी। उन्होंने सीधे बिजली खरीद जैसे उपायों से बड़ी बचत की पहल की है।
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नई परियोजनाओं और ट्रेनों की घोषणाएं कर वाहवाही लूटने से रेल का कभी भला नहीं हुआ। प्रभु मौजूदा ढांचे को ही सुधारना चाहते हैं। वह इसमें सफल होंगे, बशर्ते कार्यक्रमों और नीतियों पर अमल का बंदोबस्त भी करें। बाहर से लिए जा रहे पैसे का सदुपयोग होगा तो रेल आगे बढ़ेगी और यात्रियों को सुखद अहसास होगा, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जा सका तो रेल मौत के फंदे में चली जाएगी।
