यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 06, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सियासी नजदीकियों की भेंट चढ़ रहा वेस्ट यूपी में प्रशासन का हुनर
सियासी नजदीकियां हासिल करने का हुनर अधिकारियों की प्रशासनिक क्षमता को अपंग बना रहा है। प्रदेश में फैली यह नई ...और पढ़ें

मेरठ, [दिनेश दिनकर]। सियासी नजदीकियां हासिल करने का हुनर अधिकारियों की प्रशासनिक क्षमता को अपंग बना रहा है। प्रदेश में फैली यह नई बीमारी जिलों की प्रशासनिक साख को दीमक की तरह चाट रही है। वेस्ट के जिलों में लगातार सनसनीखेज घटनाएं हो रही हैं। कप्तान नेपथ्य में दिखते हैं और आइजी और डीआइजी को मैदान संभालना पड़ रहा है। थानेदारों की बेफिक्री अफसरों के गले की हड्डी बन रही है। पश्चिमी यूपी के तकरीबन सभी जिले इस संकट में धंसते जा रहे हैं।
सुलगा मेरठ
मेरठ के खरखौदा की घटना इस वक्त देश-दुनिया में सुर्खियों में है। एक युवती को अगवा कर मदरसे में सामूहिक दुराचार और गर्भाशय निकालने का सामने आया है। घटना पर सियासी वोल्टेज बढ़ रहा है, जबकि अधिकारी लीपापोती में जुट गए। अगर थानेदार ने य़ुवती की गुमशुदगी लिखने के बाद कुछ हाथ-पांव चलाये होते तो शायद मामला इतना तूल न पकड़ता। पीड़िता सामने आई तो उसके बयान ने तूफान खड़ा कर दिया। आरोपी ग्राम प्रधान को एक कैबिनेट मंत्री के नजदीकी होने का फायदा मिला। ज्यादातर थानेदार या तो स्वयं दबाव बनाते हैं, या फिर ऊपर के दबाव पर ऐसा करते हैं। कई बार हालात विस्फोटक हो रहे हैं।
इमरजेंसी में फेल हुए अफसर
जिले में ऐसे अधिकारियों का अकाल पड़ गया है जो हालात से निपटने के लिए फैसले ले सकें। उन्हें गैर महत्वपूर्ण महकमों का रास्ता दिखा दिया गया है। तैनाती ऐसों को थमाई गई, जिन्हें संवेदनशील जिलों के इतिहास-भूगोल का कोई इल्म नहीं, वे समझने की इच्छा भी नहीं रखते वेस्ट में मेरठ, बागपत, हापुड़, सहारनपुर और शामली समेत तकरीबन सभी जिलों में अधिकारियों का अनाड़ीपन कानून व्यवस्था को गर्त में पहुंचा रहा है। मुजफ्फरनगर दंगे में स्थानीय अफसर कांप गए, तो नई टीम लखनऊ से भेजनी पड़ी। यहां पर पहले कप्तान रह चुके आइजी को विशेष रूप से बुलाया गया। सहारनपुर के दंगे में भी भुवनेश कुमार और दीपक रतन और तीरगरान में बवाल पर काबू पाने के लिए आइजी और डीआइजी को हाथ में डंडा थामना पड़ा।
सवाल ही सवाल
खरखौदा प्रकरण बेहद संगीन होने की वजह से मदरसे भी कटघरे में हैं। अफसरों की भूमिका सवालों के घेरे में है। खरखौदा में हंगामा चला तो एसएसपी जिले से बाहर चले गए। एसपी देहात को कप्तान की भूमिका में उतरना पड़ा। आइजी के निर्देश पर डीआइजी के सत्यनारायण ने मोर्चा संभाला। आइजी को भी सहारनपुर से आना पड़ा। सहारनपुर के कप्तान राजेश कुमार पांडेय एसपी सिटी मेरठ रह चुके हैं। ऐसे में हर मामलों में डीआइजी और आइजी को कप्तान की तरह कमान क्यों संभालनी पड़ रही है?
अयोग्य थानेदार भी जिम्मेदार
अधिकांश थानेदार सियासत की दवा पीकर आए हैं। उन पर जिले के अफसर का भी रौब नहीं चलता। उनका रिमोट कंट्रोल सीधा लखनऊ से होता है, फिर भला ये जनता की क्यों सुनेंगे? पूरे मेरठ जोन में 40 से ज्यादा थानेदारों का रिमोट कंट्रोल लखनऊ से है, तभी उनके क्षेत्रों आतंक मचा हुआ है और जनता त्राहि त्राहि कर रही है।
