यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 15, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
परिवर्तन रैली में दिखी बदलते लालू की झलक
राजद की गांधी मैदान में हो रही परिवर्तन रैली में इस बार नया ट्रेंड दिखा। हमेशा राजसिंहासन जैसी कुर्सी पर ...और पढ़ें

पटना। राजद की गांधी मैदान में हो रही परिवर्तन रैली (रैली की खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें) में इस बार नया ट्रेंड दिखा। हमेशा राजसिंहासन जैसी कुर्सी पर बैठने वाले लालू जी के लिए मंच पर इस बार ऐसी 'राजसी व्यवस्था' नहीं थी। इस बार मंच पर एक सौ एक कुर्सियां लगीं और सब एक जैसी। दरअसल लालू प्रसाद यादव संदेश देना चाहते हैं कि उनकी राजनीति और सोच में काफी बदलाव आया है। पार्टी में सभी समान हैं।
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मंच लगा जैसे विवाह समारोह के लिए सजा हो
बिहार में हाल के दशकों में होने वाली किसी भी रैली में इस तरह का मंच नहीं दिखा। जेपी से लेकर लालू तक की छोटी-बड़ी ऐतिहासिक रैलियों के गवाह रहे गांधी मैदान के इस मंच पर मौसमी फूलों की मालाएं सजी हैं। झालरें लगी हैं। मंच की बाहरी दीवारों पर मधुबनी पेंटिंग मिथिला के किसी गांव की झलक दिखा रही है।
अनुशासन में कार्यकर्ता
अपने आक्रामक रुख के लिए अलग पहचान रखने वाले लालू यादव ने इस बार रैली को अनुशासन और सिस्टम की डोर में बांधा है। जिलों से आने वाली गाड़ियों पर नंबर अंकित किए गए हैं। उनके पार्किंग के नियत स्थान तय किए गए हैं। मई की कड़ी धूप में जुलूस की शक्ल में जा रहे कार्यकर्ताओं के लिए गुड़, चना और ठंडे पेयजल का जगह-जगह इंतजाम है।
उम्मीदों के आकाश में कुलांचे भर रहे लालू पुत्र
पटना [विकाश चंद्र पाण्डेय]। मामूली और हल्की सुगबुगाहट भी कभी-कभार सियासत में उलट-फेर की वजह बन जाती है। बिहार में तो मुद्दों की भरमार है। ऐसे में अगर लालू के दोनों सुपुत्र नीतीश सरकार को उखाड़ फेंकने का दम-खम भर रहे, तो इसे एक झटके से दरकिनार कर देना होशियारी नहीं। यहां जोश है लड़-भिड़ने के लिए। अपनी जमीन पर पांव टिकाने की जुगत है।
बुधवार को परिवर्तन रैली में शिरकत करने के लिए जाते लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप की तेज रफ्तार सत्ता के लिए उनके दिमाग में मची तेज खलबली की ताकीद कर रही थी। उनकी आंखों में खटकती नीतीश चाचा की सरकार और जुबान पर विरोध के मचलते बोल। यकीनन राजद की बागडोर आहिस्ता से अगली पीढ़ी के हवाले हो रही है। बयान इसकी बानगी है। बकौल तेज प्रताप, हम दोनों भाई मिलकर एक नए बिहार की स्थापना करेंगे। आज युवा वर्ग पलायन के लिए मजबूर है। मेरा आग्रह है कि वे परिवर्तन में शरीक हों, और उसके बाद बिहार में ही रहने की सोचें। स्पष्ट है कि राजद के एजेंडे में युवा तबके को खास अहमियत मिल चुकी है।
पुराने बयानों के हवाले से तेज प्रताप कहते हैं, चुनाव के दिनों में नीतीश चाचा की बातों को याद कीजिए। उन्होंने तीन महीने के भीतर बिहार को पेरिस बना देने का वादा किया था। बिहार पेरिस तो बना नहीं, अलबत्ता अफसरशाही हावी हो गई। जनता की मजबूरियां बढ़ गई। लोग खाने तक के लिए तरस रहे। नियोजित शिक्षकों पर पुलिस लाठीचार्ज करती है। वे गुरु हैं, जिन पर अत्याचार हो रहा। हम दोनों भाई मिलकर इस व्यवस्था को बदल लेंगे।
सत्ता के लिए यह बेसब्री कोई नई बात नहीं। हालांकि विरोधी यह कह सकते हैं कि राजनीति के लिए जिस सधी चाल और सूझ-बूझ की दरकार होती है, तेज प्रताप में वह अभी कच्ची है। मुमकिन है कि उनकी बातों में सच्चाई हो, लेकिन दूसरे छोर से अपनी चुस्त और चालाक अंदाज में तेजस्वी परिवर्तन की छटपटाहट को व्यर्थ नहीं जाने देने के लिए कमर कस चुके हैं। नीतीश चाचा की सरकार उनके लिए भी एक चुनौती की तरह है। सियासत और सत्ता में अपनी जगह के लिए उन्हें इस सरकार को बेनकाब करना होगा। तेजस्वी इसका साफ संकेत दे रहे हैं।
अव्यवस्था और अराजकता का हवाला देते हुए तेजस्वी कहते हैं कि नीतीश चाचा की गलत नीतियों के खिलाफ हम जनता को एकजुट करेंगे। विकास का ढोंग अब ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला। हम जमीनी हकीकत को जगजाहिर कर देंगे। वे पूछते हैं कि अगर विकास है, तो फिर पलायन क्यों? युवा वर्ग में क्षोभ है। यहां तो रोजी-रोटी की किल्लत है। दूसरे राच्यों में हमारी छवि अच्छी नहीं। विगत दिनों दुष्कर्म के एक-दो मामलों से बिहार की छवि धूमिल हुई है। हम राच्य को इस स्थिति से उबारने में समर्थ होंगे। हमारे युवा कार्यकर्ताओं में जोश है। यकीनन पटना में उमड़ा राजद कार्यकताओं का हुजूम और उस हुजूम में युवाओं की एकजुटता तेजस्वी के लिए उम्मीदों की धरातल तैयार कर रही है।
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