यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 24, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
केजरीवाल ने जिद-जुनून से जीता जनता का भरोसा
अरविंद केजरीवाल जल्दी ही एक बार फिर रामलीला मैदान के मंच पर होंगे। लेकिन इस बार किसी सरकार से अपनी ...और पढ़ें

नई दिल्ली [मुकेश केजरीवाल]। अरविंद केजरीवाल जल्दी ही एक बार फिर रामलीला मैदान के मंच पर होंगे। लेकिन इस बार किसी सरकार से अपनी मांगे मनवाने के लिए नहीं बल्कि खुद 'सरकार' बनने। ढाई साल में वक्त ने ऐसी करवट बदली है कि कभी इस मैदान की बुकिंग के लिए सरकारी इजाजत की बाट जोहने वाले केजरीवाल के लिए बुकिंग भी सरकारी होगी और स्वागत के इंतजाम भी। दिल्ली के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर केजरीवाल सरकार की यह शपथ एक सूबे की नहीं बल्कि पूरे देश में नए किस्म की सियासत का आगाज भी होगी।
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मुख्यमंत्री के तौर पर शुरू हो रही केजरीवाल की नई पारी पर पूरा देश टकटकी लगाए है। क्योंकि यह केवल एक नई पार्टी की सरकार नहीं बल्कि देश में नेता और सत्ता का नए किस्म का प्रयोग भी है। अब तक बाहर बैठ कर आरोप लगाते रहे इस नए-नवेले नेता पर अब खुद कुछ कर दिखाने की चुनौती होगी। साफ-सुथरी राजनीति और आम आदमी की सरकार बनाने की बातों से जनता की जो उम्मीदें 45 साल के केजरीवाल ने जगाई है, सख्त और निर्मम निगरानी की कसौटी पर उनकी परीक्षा भी रोज होगी। महज एक साल में सड़क से सिंहासन पर बैठाने वाला आम आदमी उनको आंकने के लिए पांच साल का इंतजार नहीं करेगा।
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कुछ लोग भले ही उन पर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए अन्ना हजारे का इस्तेमाल करने का आरोप लगाएं, लेकिन यह भी सच है कि देश की एक बड़ी आबादी का राजनीति और सकारात्मक बदलाव में यकीन भी 'अरविंद ब्रांड' राजनीति ने लौटाया है। जाति, धर्म और सांप्रदाय की भावनाएं भड़काए बिना केवल कुछ महीनों में सवा करोड़ मतदाताओं से विधानसभा में 28 सीटों का जो जनादेश उन्होंने अकेले अपने दम पर हासिल किया है, वह देश के इतिहास में एक अनूठा मुकाम है। शून्य से शिखर तक पहुंचना अरविंद का जुनून भी है और जिद भी और इसका नमूना आइआइटी और सिविल सर्विस की परीक्षा से लेकर चुनावी इम्तिहान तक मिलता रहा है। जिद अरविंद की ताकत है तो कमजोरी भी।
यही वजह है कि अरविंद के कुछ पुराने साथी इन पर मनमानी और अलोकतांत्रिक रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए अलग भी होते रहे हैं। दुबली कद-काठी के इस आदमी ने हर बार अपनी जीवट और हिम्मत का लोहा मनवाया है। स्कूली पढ़ाई कर रहे अपने दोनों बच्चों और आइआरएस पत्नी को अरविंद ने अब तक तो अपने राजनीतिक जिंदगी से पूरी तरह दूर रखा है।
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