यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 07, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
रेलवे में मंत्रियों के ‘दुर्घटनाग्रस्त’ होने से चिंतित हैं निवेशक
जब दुर्घटना का अंदेशा हो तो भला कौन यात्री ट्रेन में बैठना चाहेगा? रेलवे में निवेश करने वाले देशी-विदेशी निवेशकों ...और पढ़ें

संजय सिंह, नई दिल्ली। जब दुर्घटना का अंदेशा हो तो भला कौन यात्री ट्रेन में बैठना चाहेगा? रेलवे में निवेश करने वाले देशी-विदेशी निवेशकों का कुछ ऐसा ही हाल है। वे रेलवे में तब तक निवेश नहीं करना चाहते जब तक कि नीतियों में निरंतरता और निर्णयों में एकरूपता का भरोसा नहीं हो जाता।
यह तभी होगा जब सरकार की तरह मंत्री भी टिक कर काम करें, लेकिन रेलवे में तो ट्रेनों की तरह फिलहाल मंत्रियों के ‘दुर्घटनाग्रस्त होने का क्रम भी जारी है। रेलवे में एक बार फिर से निवेश की कार्यशालाएं शुरू हो गई हैं।
यह अलग बात है कि इस तरह की कई कार्यशालाएं पहले भी हो चुकी हैं, और उनका कोई प्रतिफल सामने नहीं आया है। इससे पहले लालू प्रसाद ने एसोचैम के साथ निवेशक सम्मेलन किया था। यहां तक कि उन्होंने हॉर्वर्ड के छात्रों को भी बुलाया और सिंगापुर के लीड्स इंस्टीट्यूट के साथ करार किया।
ममता बनर्जी ने भी अमित मित्र की सलाह पर दिल्ली में निवेशक सम्मेलन आयोजित किया था। अब सुरेश प्रभु वही कर रहे हैं। फर्क इतना है कि इस बार मोदी सरकार है, जिसने पूर्ण बहुमत के बूते रेलवे में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश के दरवाजे खोल दिए हैं।
लालू का यूरोप दौरा तो बेकार गया था पर सुरेश प्रभु को उम्मीद है कि उनकी टीम जब सिंगापुर, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्रांस, बेल्जियम में रोड शो करेगी तो विदेशी निवेश अवश्य आएगा। लेकिन खुद इन कंपनियों के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे तब तक पैसा लगाने वाली नहीं जब तक कि इस बात का भरोसा नहीं हो जाता कि सुरेश प्रभु टिकेंगे।
दरअसल, वे डरे हुए हैं। लालू के बाद पिछले पांच सालों में रेलवे में सात मंत्री बदल चुके हैं। सुरेश प्रभु आठवें हैं। इससे पहले ममता बनर्जी, दिनेश त्रिवेदी, मुकुल राय, सीपी जोशी, पवन बंसल, मल्लिकार्जुन खड़गे और सदानंद गौड़ा को वक्त से पहले मंत्रलय छोड़ना पड़ा। राय और जोशी को तो दो-दो बार थोड़े समय के लिए चार्ज मिला। हालत यह है कि रेलवे में जो साल भर से ऊपर टिक गया उसे सौभाग्यशाली माना जाता है।
