यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 08, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष : दुनिया डराएगी, पर डरने का नहीं...!!!
विश्व महिला दिवस यानि एक बार फिर जगह-जगह समारोह, भाषणबाजी, बड़े-बड़े संकल्प व वादे और फिर स्थिति जस की तस। आखिर कब तक महिलाएं महज विचार-विमर्श की विषय-वस्तु बनकर रहेंगी।

नई दिल्ली, [प्रतिभा गुप्ता/ सुचि सिन्हा]। विश्व महिला दिवस यानि एक बार फिर जगह-जगह समारोह, भाषणबाजी, बड़े-बड़े संकल्प व वादे और फिर स्थिति जस की तस। आखिर कब तक महिलाएं महज विचार-विमर्श की विषय-वस्तु बनकर रहेंगी। फिर खुद महिलाओं का ध्यान इस ओर क्यों नहीं जाता कि समस्याएं उनकी, चुनौतियां उनकी तो फिर पुरुष वर्ग कौन होते हैं उनको सशक्त बनाने वाले? देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भी इस बार महिला जनप्रतिनिधि सभा को संबोधित करते हुए यह गंभीर सवाल उठाया है और वाकई में यह असल मायने में विचार-मंथन का विषय है खास तौर से महिलाओं के लिए। मोदी जी ने कहा, 'मेरे हिसाब से महिला सशक्तिकरण को लेकर सोच बदलने की जरूरत है। आप उसे सशक्त बनाते हैं, जो कमजोर है। जिनके पास क्षमता है शक्ति है, उसे सशक्तिकरण की जरूरत नहीं।'
पढ़ें: महिला दिवस पर कार्यशाला आज
सच में, अब तक जो पुरुष वर्ग, महिलाओं के साथ असमानता का व्यवहार करता और उनके अस्तित्व को कुचलता रहा है, सिर्फ उस वर्ग से ही 'महिला उत्थान' की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि पुरुष वर्ग की महत्ता को नकार रहे हैं, समाज में दोनों वर्गों का समान स्थान है। मगर दुनिया की आधी आबादी के प्रति सहयोगात्मक रवैया न अपनाते हुए उसे अधिकारों से वंचित रखने, हमेशा कम आंकने में कहीं ना कहीं ये वर्ग ही जिम्मेदार है। ऐसा भी नहीं है कि स्थितियों में सुधार नहीं हुआ है, मगर यह एक खास तबके की महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। अगर हम सिर्फ शहरी और ग्रामीण तबके की महिलाओं की बात करें तो भी उनके बीच व्यापक अंतर नजर आता है, जिसे खत्म करने में पुरुष, परिवार, समाज, सरकार के साथ-साथ खुद महिलाओं को निडर होकर आगे आना होगा। तमाम बंदिशें लगाएगी, दुनिया डराएगी, पर डरने का नहीं...!!!
आइए जानते हैं महिलाओं के मुद्दों से सक्रिय तौर पर जुड़ीं इन महिला विशेषज्ञों की क्या राय है-
रंजना कुमारी, सामाजिक कार्यकर्ता
वैसे तो महिलाओं की स्थिति बदल रही है, वो सशक्त हैं। मगर उन्हें सहयोग की जरूरत है और इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है। राजनीति में 33 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है और वहीं से शुरुआत होनी चाहिए। देश में महिलाओं के लिए ढेरों कानून हैं, मगर उनका सुचारू रूप से पालन नहीं हो रहा है। महिलाओं के उत्थान के लिए आधे-अधूरे प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में गांव हो या शहर, शिक्षा और रोजगार महिलाओं के लिए बेहद जरूरी है। सबसे ज्यादा आर्थिक आत्मनिर्भरता जरूरी है।
महिला दिवस विशेष : हाथ में रही बागडोर, पैदा नहीं होने दिया तनाव
स्वाति मालीवाल, दिल्ली महिला अायोग अध्यक्ष
देश में महिलाओं से जुड़ीं बहुत सारी समस्याएं हैं, खास कर राजधानी की बात करें तो यह 'रेप कैपिटल' बन गई है। अधेड़ उम्र की महिलाओं से लेकर ढाई साल की बच्चियां तक यहां सुरक्षित नहीं हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक सभी को मिलकर काम करने की जरूरत है। वहीं, एक दिन महिला दिवस मनाकर हम कुछ साबित नहीं कर सकते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस होगा, कुछ महिलाओं को सम्मानित भी किया जाएगा। मगर साल के 364 दिन महिलाओं की स्थिति जस की तस रहेगी। तो हर दिन महिला दिवस मनाने की जरूरत है। महिलाओं को तो परिवार में हो या घर से बाहर हर जगह खुद को साबित करने के लिए जंग लड़नी पड़ती है। जरूरत है परिवार वालों को भी आगे आने की, चाहें बेटा हो या बेटी दोनों को समानता के अधिकार की शिक्षा दी जाए और किसी को एक दूसरे से कम नहीं आंका जाए।
वर्तिका नंदा, लेखिका
मुझे लगता है कि महिला दिवस को बंद कर देना चाहिए। यह एक किटी पार्टी की तरह हो गया है, जिसको कोई मतलब नहीं है। महिलाओं का एक तबका और है, जिस ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए और वो तबका है महिला कैदियों का। ऐसे महिला कैदी, जो जेल की सलाखों के पीछे होते हुए भी वो अपने अाप को साबित करने में लगी हैं, मगर सरकार की नजर उन तक पहुंच नहीं पा रही हैं। जरूरत है उनको भी नई शुरुआत का मौका देने की, ताकि वो एक बार फिर से समाज में आम महिला की तरह जिंदगी बसर कर सकें। वहीं वो वक्त भी आ गया है, जब कागजी कानून की समीक्षा की जाए और उनको लागू कराने की पूरी कोशिश की जाए।
मनीषा, वरिष्ठ पत्रकार
महिलाओं को मानसिक रूप से मजबूत होने और अपनी हिस्से की लड़ाई खुद लड़ने की जरूरत है। लड़के और लड़कियों में बराबरी का मुकाबला होना चाहिए और परिवार से लेकर स्कूल तक दोनों के बीच के भेदभाव को खत्म करने की जरूरत है। परिवार में जहां लड़के-लड़की दोनों को एक समान काम देने की शुरुआत करनी होगी, क्योंकि लड़कियां किसी भी मामले में लड़कों से कम या कमजोर नहीं है, यह सोच बदलनी होगी। वहीं स्कूलों में भी लड़के और लड़कियों में समान भागीदारी होनी चाहिए। बराबरी के मुकाबले के लिए शिक्षा बेहद अनिवार्य है और हर क्षेत्र में महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए। ये सोच कर उन्हें नहीं रोकना चाहिए वो ये काम नहीं कर सकती हैं। कुल मिलाकर महिलाओं को अपनी सोच बदलने और खुद आगे बढ़कर अपनी लड़ाई लड़ने की जरूरत है। उन्हें ये समझने की जरूरत है कि ये उनका अधिकार है, उन्हें कोई खैरात नहीं मिल रही है।
अंत में आपके लिए ये खूबसूरत पंक्तियां-
आया समय
उठो तुम नारी
युग निर्माण तुम्हें करना है
आजादी की खुदी नींव में
तुम्हें प्रगति पत्थर भरना है
अपने को
कमजोर न समझो
जननी हो सम्पूर्ण जगत की
गौरव हो
अपनी संस्कृति की
आहट हो स्वर्णिम आगत की
तुम्हे नया इतिहास देश का
अपने कर्मो से रचना है
शिक्षा हो या
अर्थ जगत हो
या सेवाये हों
सरकारी
पुरूषों के
समान तुम भी हो
हर पद की सच्ची अधिकारी
तुम्हें नये प्रतिमान सृजन के
अपने हाथों से गढ़ना है
