विधान परिषद चुनाव के नतीजों में कांग्रेस का खाता शून्य, चुनावी रण में क्यों संघर्ष कर रही पार्टी?
बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र सहित चार राज्यों में विधान परिषद चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा, जहां पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई।
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कांग्रेस को चार राज्यों में विधान परिषद चुनाव में शून्य सीटें मिलीं

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संजय मिश्र, नई दिल्ली। बिहार और कर्नाटक समेत चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों के चुनाव में कांग्रेस का खाता शून्य रहने से साफ है कि पार्टी भले राजनीतिक मोर्चे पर संसद से सड़क तक भाजपा-एनडीए के खिलाफ सियासी लड़ाई मजबूती से लड़ती दिख रही हो मगर चुनावी रण में अब भी पार्टी संघर्ष करती नजर आ रही है।
बिहार तथा महाराष्ट्र में रणनीतिक चूक पार्टी उम्मीदवारों के हार का कारण बताया जाए मगर कर्नाटक में मिली शिकस्त जरूर कांग्रेस के लिए चिंतत का सबब है।
कांग्रेस को चार राज्यों में विधान परिषद चुनाव में शून्य सीटें मिलीं
पार्टी वहां सत्ता में है और हाल में दो विधानसभा सीटों के उपचुनाव में जीत के बाद विधान परिषद चुनाव में उस झटका तब लगा है जब डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया है। वहीं बिहार में विधान परिषद चुनाव हार के बाद पार्टी में एक बार फिर एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है।
वरिष्ठ नेता अखिलेश सिंह और सांसद मनोज कुमार सरीखे नेताओं ने टिकट बंटवारे से लेकर प्रदेश नेतृत्व की जवाबदेही का सवाल उठाते हुए बिहार कांग्रेस में बदलाव की मांग को एक बार फिर हवा दे दी है।
विधान परिषद चुनाव परिणामों के सियासी मायनों का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि राजनीतिक गरमागरमी के मौजूदा माहौल में पीएम मोदी ने भी मौका न चूकते हुए कांग्रेस पर तंज कसा।
महाराष्ट्र में नागपुर की अपनी एक सीटिंग सीट पर कांग्रेस अपने गठबंधन साथी एनसीपी-एसपी के बागी उम्मीदवार के मैदान में हाेने के कारण हार गई। कर्नाटक की चार में से कांग्रेस के पास एक सीट थी मगर पार्टी वह भी नहीं बचा पायी।
उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने सपा के लिए मैदान छोड़ दिया था। मगर बिहार में राजद से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का दांव कामयाब नहीं रहा। दरभंगा की एकमात्र सीटिंग सीट पर कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदनमोहन झा जन सुराज उम्मीदवार से हार गए।
जाहिर तौर पर मैदान में उतरे राजद उम्मीदवार ने उनकी हार में अहम भूमिका निभाई।राजद से गठबंधन के बिना भी बिहार में पार्टी की सूरत नहीं बदलने के लिए चाहे जो कारण गिनाए जाएं मगर हकीकत यह भी है कि कांग्रेस हाईकमान को प्रदेश संगठन की कोई सुध नहीं है।
नेतृत्व पर सवाल, रणनीतिक चूक, टिकट बंटवारे पर उठे प्रश्न
विधानसभा चुनाव के अब एक साल होने को हैं मगर पार्टी की हार के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले राजेश राम तथा प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरू के इस्तीफे पर नेतृत्व की दुविधा ऐसी है कि अभी तक कोई फैसला नहीं लिया जा सका है।
जबकि सूबे के कई नेता बार-बार शीर्ष नेतृत्व से संगठन को प्रभावी बनाने के लिए बदलाव की मांग करते रहे हैं। मिथिलांचल से ताल्लुक रखने वाले बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता किशोर कुमार झा ने पार्टी के दयनीय प्रदर्शन पर चिंता जताते हुए साफ कहा कि प्रदेश नेतृत्व की गलत रणनीति के कारण जो हुआ है उससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भयंकर आक्रोश है।
आलाकमान को इसे बहुत गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि मिथिलांचल में जनसुराज का खाता खुलना भविष्य में कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित होगा।
बिहार कांग्रेस के प्रभारी अल्लावरू के संगठन की मजबूती के लिए संगठन सृजन के किए जा रहे दावों को खोखला बताते हुए किशोर झा ने कहा कि केवल पटना में बैठक कर कागजो में पार्टी को मजबूत दिखाने का नेतृत्व को झांसा दिया गया, जमीन पर पार्टी की मजबूती के लिए कुछ नहीं किया। इसलिए अविलंब प्रदेश प्रभारी बदलने का निर्णय लिया जाना पार्टी हित में जरूरी है।
राज्यसभा सांसद वरिष्ठ नेता अखिलेश सिंह ने भी हार के लिए प्रभारी और प्रदेश नेतृत्व की जिम्मेदारी की ओर संकेत करते हुए जवाबदेही तय किए जाने की वकालत की।
साथ ही इशारों में उम्मीदवारों के चयन पर भी सवाल उठाए।सासाराम के लोकसभा सांसद मनोज कुमार ने भी कुछ ऐसी ही राय जाहिर करते हुए बिहार कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को दुरूस्त किए जाने पर जारे दिया।
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