यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 26, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
मोदी सरकार के तीस दिन, एक महीने में बदली कार्य संस्कृति
पहले महीने में ही कामकाज की संस्कृति बदलने में कामयाब रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की समीक्षा के लिए ...और पढ़ें

नई दिल्ली, [जागरण ब्यूरो]। पहले महीने में ही कामकाज की संस्कृति बदलने में कामयाब रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की समीक्षा के लिए पूरे पांच साल का वक्त भले ही चाहते हों, लेकिन आकलन अभी से शुरू हो गया है। फब्ती कसी जाने लगी है कि 'अच्छे दिन' अब 2019 में ही आएंगे। वहीं मोदी की कार्यशैली को भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया जाने लगा है।
इससे शायद ही कोई इन्कार करे कि केंद्र में मोदी सरकार के आते ही संस्कृति बदलने लगी है। अपनी खास कार्यशैली के जरिए ही गुजरात को विकास की राह पर लाने वाले मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि नई सरकार में हर किसी को तय दिशा निर्देश के अनुसार ही व्यवहार करना होगा। पुरानी सरकार में फैसला लेने से हिचक रहे अधिकारियों को यह भरोसा दिया गया कि मंशा सही हो तो उसके पीछे पूरी सरकार खड़ी रहेगी। नीतिगत अनिर्णयता से सरकार को बाहर निकालने के लिए यह बड़ा कदम है। इससे पहले छोटा कैबिनेट बनाने और मंत्रियों के स्टाफ में निजी सगे संबंधियों को रखने पर पाबंदी लगाकर यह भी संकेत दिया जा चुका है कि लूट की छूट किसी को नहीं होगी।
बहरहाल संस्कृति में हुए परिवर्तन ने भी विपक्ष को हमले का मौका दे दिया है। कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने कहा कि जिस तरह सचिवों को सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करने को कहा गया है उससे कैबिनेट सिस्टम कमजोर होगा। इस सरकार में तो अब तक मंत्रियों को अपना स्टाफ भी नहीं मिल पाया है। सरकार में नंबर दो राजनाथ सिंह भी मनपसंद निजी स्टाफ नहीं रख पा रहे हैं तो साफ है मोदी सत्ता को स्वयं तक सीमित रखना चाहते हैं। रेल किराये में बढ़ोत्तरी, तेज हुई चीनी की कीमत, बजट में कठोर कदमों के संकेत ने भी विपक्ष को हमले का मौका दे दिया है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी खजाने की हालत का इजहार करते हुए भरोसा दे चुके हैं कि देश हित के लिए यह जरूरी है। सच्चाई यह है कि मोदी सरकार को पहले एक माह में संभवत: व्यवस्था से लेकर फाइलों तक पर पड़ी धूल को झाड़ने की कोशिशों से ही फुर्सत नहीं मिली। मोदी जिस मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस की बात करते थे उसकी झलक आते ही दिखने लगी है। नीतिगत निर्णय की बारी आगे आने वाली है। कालेधन को लेकर सरकार ने अपनी सक्रियता जरूर दिखा दी है। इस छोटी अवधि में एक बड़ी उपलब्धि विदेश के मोर्चे पर रही। शपथग्रहण के वक्त सार्क देशों के साथ रिश्ते को लेकर नई बहस छिड़ी और पाकिस्तान के साथ संबंध की दिशा फिलहाल सकारात्मक दिखी।