यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 11, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
1978 में फ्लाप हुई थी 1000, 5000, 10000 के नोट बंद करने की रणनीति
जाली मुद्रा को व्यवस्था से बाहर करने के लिए 500 व 1000 रुपए के नोट को बंद करना क्रांतिकारी कदम कहा जा रहा है।

नई दिल्ली, जेएनएन। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा काला धन, भ्रष्टाचार और जाली मुद्रा को व्यवस्था से बाहर करने के लिए 500 व 1000 रुपए के नोट को बंद करना क्रांतिकारी कदम कहा जा रहा है। निश्चित रूप से यह है भी।
किंतु इससे पहले जब भारत में किसी सरकार ने बड़े नोट बंद किए थे, तब वह प्रयास उतना सफल नहीं हो पाया था, जितना कि उम्मीद थी। हालांकि उस समय सरकार की नीतिगत खामियों के कारण ऐसा हुआ था।
किस्सा सन् 1978 का है। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने तब देश की अर्थव्यवस्था में प्रचलित बड़े नोट (1000, 5000 व 10000 रुपए) को बंद करने की घोषणा की थी। हालांकि वह अचानक नहीं किया गया था इसलिए धनाढ्यों को संभलने का मौका मिल गया था। ये वो दौर था जब देश की आम जनता के पास वैसे भी ज्यादा पैसा नहीं होता था।
आम लोग मितव्ययी थे और बहुत कम नकदी में अपना काम चला लेते थे। ऐसे में एक, पांच या दस हजार के बड़े नोट या तो बैंकों के पास थे या बड़े उद्योगपतियों व प्रतिष्ठानों के पास। इनमें से भी अधिकांश ने तो बैंक में शपथ पत्र देकर बंद हुए नोटों को अपने खातों में भुना लिया था।
तब 10000 मूल्य के नोट तो पूरी अर्थव्यवस्था में महज 1 हजार 260 ही थे। ऐसे में कमजोर रणनीति के कारण कुल प्रतिबंध का असर सिर्फ इतना था कि बाजार से 120 करोड़ रुपए ही बंद हुए थे।
इसके पहले 1946 में भी भारत में 500 रुपए के नोट बंद किए गए थे, लेकिन तब देश में अंग्रेजों का शासन था इसलिए उस समय के आधिकारिक आंकड़े कहीं भी रिकॉर्ड में नहीं हैं।
(नईदुनिया संदर्भ)
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