यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 01, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
चारा घोटाला: अमित खरे के सुबूतों ने लिखी इंसाफ की पटकथा
चारा घोटाले की पहली परत खोलने वाले अमित खरे के चेहरे पर 17 साल बाद आए अदालत के फैसले से ...और पढ़ें

नई दिल्ली, राजकेश्वर सिंह। चारा घोटाले की पहली परत खोलने वाले अमित खरे के चेहरे पर 17 साल बाद आए अदालत के फैसले से बेहद संतोष था। तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपने कर्तव्य पर डटे रहे खरे इसे व्यक्तिगत नहीं, बल्कि ईमानदारी की जीत मानते हैं। उनके इस भरोसे का ही नतीजा है कि करोड़ों के घोटालेबाज नेता व अफसर सलाखों के पीछे हैं।
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भारतीय प्रशासनिक सेवा [आइएएस] के 1985 बैच के अफसर अमित खरे ही वह व्हिसिलब्लोअर [भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले] हैं, जिन्हें 27 जनवरी, 1996 को सरकारी बिलों के भुगतान की पड़ताल का ख्याल आया। उस समय वही बिहार के चाईबासा में कलेक्टर थे। अब चाईबासा झारखंड में है। उन्होंने 27 जनवरी, 1996 को खुद ट्रेजरी कार्यालय पहुंचकर घोटालों के न सिर्फ कागजी सुबूतों को जुटाया, बल्कि उन्हें नष्ट होने से बचाने के लिए गवाहों के सामने उसकी वीडियोग्राफी कराके कार्यालय को सील भी करा दिया। फिर तो बिहार के वित्त आयुक्त के निर्देश पर दूसरे जिलों में छापे पड़ने लगे। घोटाले परत दर परत खुलते चले गए। अमित खरे अब केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं।
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सोमवार को जब देशभर की नजरें चारा घोटाले के दोषियों राजद प्रमुख लालू प्रसाद समेत दूसरे नेताओं और मामले से जुड़े नौकरशाहों को सुनाई जाने वाली सजा पर थी, तब भी खरे अलग-जगहों पर होने वाली चार बैठकों में मशगूल थे। फैसले पर अमित खरे ने 'दैनिक जागरण' से कहा, 'मेरा मानना है कि नौकरशाहों को खास पोस्टिंग के बजाय अपनी जिम्मेदारी पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।' खरे को लगता है कि सीबीआइ की जांच और पटना हाईकोर्ट की निगरानी न होती तो इतने बड़े-बड़े लोगों तक कानून का हाथ पहुंच पाना आसान नहीं था।
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