यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 30, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
ट्रेजडी किंग का एकछत्र राज
हां, तो फिल्म 'शहीद' की सफलता ने लोगों के दिलों में दिलीप कुमार के लिए कुछ जगह बना दी। इसी ...और पढ़ें

मुंबई। हां, तो फिल्म 'शहीद' की सफलता ने लोगों के दिलों में दिलीप कुमार के लिए कुछ जगह बना दी। इसी फिल्म में उनके काम की समीक्षकों ने भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि दिलीप कुमार पूरी फिल्म में छा गए। फिर आई 21 मार्च 1949 की तारीख, जिसने न केवल उनके खाते में, बल्कि हिंदुस्तान के इतिहास में ऑल टाइम हिट फिल्म दी। जी हां, हम 'अंदाज' की बात कर रहे हैं। उस फिल्म ने उन्हें बेमिसाल कलाकार के तौर पर स्थापित कर दिया। उन्हें ट्रेजडी किंग का भी दर्जा दिया। सार-संक्षेप में कहें, तो 'अंदाज' के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। महबूब खान के साथ भी उनका एसोसिएशन उसके बाद 'मदर इंडिया' तक बदस्तूर चलता रहा। 'अंदाज' में महबूब खान से दिलीप कुमार को फिल्म में लेने के लिए नौशाद ने कहा था। फिल्म की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने उस समय महज 28 सप्ताह में सात लाख की कमाई की थी, वह भी अकेले मुंबई के लिबर्टी सिनेमा हॉल में।
'अंदाज' के बाद दिलीप कुमार की इमेज ट्रेजडी किंग की बन गई। उसके बाद उन्हें वह इमेज आगे भी कायम रखनी पड़ी। 'अंदाज' के तुरंत बाद इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित 'आरजू' से भी उन्होंने धूम मचाई। हालांकि उसके बाद दिलीप कुमार और कामिनी कौशल की ऑन स्क्रीन जोड़ी टूट गई। उसके बाद दोनों का जादू एक साथ स्क्रीन पर नहीं दिखा। कामिनी दिलीप कुमार के साथ रिश्ते में पड़ना चाहती थीं, लेकिन दिलीप साहब की ओर से कोई रिप्लाई नहीं हुआ। उसकी वजह थी कि कामिनी शादीशुदा थीं, बहरहाल कामिनी के बाद एक और युवा अभिनेत्री थीं, जो दिलीप कुमार को पसंद करती थीं। उनकी उम्र उस वक्त महज 17 साल थी। 'तराना' के सेट पर उनका प्यार जवां हुआ। जी हां, हम हुस्न की मलिका मधुबाला की बात कर रहे हैं। दोनों ने बाद में 'संगदिल' और 'मुगल-ए-आजम' में धूम मचाई।
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पांचवें दशक में महबूब खान ने तकनीक अडॉप्ट करने की अगुवाई करते हुए हिंदुस्तान को पहली कलर फिल्म 'आन' दी। वह पहली ऐसी फिल्म भी बनी, जो हिंदी के अलावा एक साथ तमिल और अंग्रेजी भाषाओं में रिलीज हुई। फिल्म को बनने में तीन साल लगे, लेकिन लंबा इंतजार और लगन रंग लाया। फिल्म कमाल की हिट हुई। दिलीप कुमार पहली बार मारधाड़ से भरपूर रोल में नजर आए। उनके प्रशंसकों के लिए पहला मौका था, जब उनका पसंदीदा हीरो पहले की फिल्मों के उलट अपनी माशूका के न मिलने पर रोने की बजाय विलेन से लड़ता है। महबूब ने 'आन' से नादिरा को लॉन्च किया। दिलीप कुमार और महबूब का साथ 'अमर' तक बना रहा। 'मदर इंडिया' में भी महबूब ने दिलीप कुमार को कास्ट किया था, लेकिन बातचीत के दौरान जब दिलीप कुमार ने उनसे कहा कि वे तीनों मुख्य भूमिकाएं यानी राजकुमार, सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार वाली खुद करेंगे, जो महबूब खान को मंजूर नहीं था। इस बात को लेकर विवाद हुआ, लिहाजा दोनों उस प्रोजेक्ट के बाद से अलग हो गए, फिर साथ काम नहीं किया।
1950 के बाद तो दिलीप कुमार हिंदी फिल्मों के पटल पर छा गए। बिमल राय ने उन्हें 'देवदास' में मुख्य भूमिका दी और दिलीप कुमार ने उसमें कमाल का काम किया। उनसे पहले के. एल. सहगल 1935 में वह रोल कर चुके थे और जब दिलीप कुमार के पास यह ऑफर मिला तो उन्होंने फिल्म देखने से मना कर दिया। रिमेक को लेकर उनकी अपनी सोच थी। उनका मानना था कि रिमेक फिल्म में एक कॉन्ट्रास्ट होना जरूरी है। उसके लिए जरूरी है कि पहले वाली फिल्म न देखी जाए। फिल्म में उनके अपोजिट पहले नरगिस और मीना कुमारी को कास्ट करने पर विचार हुआ। वैजयंती माला के बेहतरीन डांसर होने के चलते उन्हें चंद्रमुखी का रोल देने पर फैसला हुआ। पारो का रोल बंगाली फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री सुचित्रा सेन ने किया। फिल्म 30 मार्च 1956 को रिलीज हुई और वह सबसे बेहतरीन हिंदी क्लासिक फिल्मों में शुमार हुई। (क्रमश:)
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