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    ब्रिटिश हाईकोर्ट ने अस्वीकार की आतंकी के प्रत्यर्पण की अर्जी, खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स के सरगना कुलदीप सिंह का है मामला

    कुलदीप सिंह पर 2015-16 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की हत्या की साजिश रचने का आरोप है। इसके लिए 44 वर्षीय कुलदीप सिंह ने पंजाब में धन देकर केजेडएफ के सदस्य बनाए और एक गुरुद्वारे में उनकी बैठक करवाई।

    By Dhyanendra Singh ChauhanEdited By: Updated: Thu, 09 Dec 2021 09:44 PM (IST)
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    भारत में कुलदीप सिंह पर दर्ज हैं चार मामले

    लंदन, प्रेट्र। ब्रिटेन में हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील करने की भारतीय अधिकारियों की अर्जी अस्वीकार कर दी है। भारत की ओर से यह अर्जी प्रतिबंधित आतंकी संगठन खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स (केजेडएफ) के वरिष्ठ सदस्य कुलदीप सिंह के प्रत्यर्पण के सिलसिले में दी गई थी। मजिस्ट्रेट कोर्ट (निचली अदालत) ने मानवाधिकारों के आधार पर कुलदीप सिंह को प्रत्यर्पित करने की भारत की याचिका खारिज की है।

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    भारत में कुलदीप सिंह पर चार मामले दर्ज

    कुलदीप सिंह उर्फ कीपा सिद्धू पर 2015-16 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की हत्या की साजिश रचने का आरोप है। इसके लिए 44 वर्षीय कुलदीप सिंह ने पंजाब में धन देकर केजेडएफ के सदस्य बनाए और एक गुरुद्वारे में उनकी बैठक करवाई। भारत में कुलदीप सिंह पर चार मामले दर्ज हैं। इनमें से एक मामला गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) का है। कुलदीप ने कुछ दिन पाकिस्तान में रहकर अपने संगठन की गतिविधियों को विस्तार दिया। 2005 में वह अवैध तरीके से ब्रिटेन आया। वहां पर गिरफ्तार होने के बाद उसे अक्टूबर 2019 में जमानत मिल गई। सितंबर 2020 में भारतीय अधिकारियों ने अर्जी देकर कुलदीप की जमानत रद करा दी।

    मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले में कोई गलती नहीं : पीठ

    ब्रिटिश मजिस्ट्रेट कोर्ट में जिला न्यायाधीश जेरेथ ब्रैंसन ने मानवाधिकार के यूरोपीय समझौते का हवाला देते हुए बीती जनवरी में भारतीय अधिकारियों की कुलदीप के प्रत्यर्पण की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट में जस्टिस निकोला डेविस और जस्टिस पुष्पिंदर सिंह की पीठ ने कहा, मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले में कोई गलती नहीं है। उसने याचिका अस्वीकार करने का कारण स्पष्ट रूप से बताया है। इसलिए कोई कारण नहीं बनता कि मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश में दखल दिया जाए।

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