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    अफगानिस्‍तान की यह घाटी तालिबान कब्‍जे से मुक्‍त, काबुल से 125 किमी दूर है पंजशीर, जानें यहां किसका चलता है शासन

    By Ramesh MishraEdited By:
    Updated: Sun, 22 Aug 2021 02:38 PM (IST)

    दो दशक पूर्व तालिबान ने जब अफगानिस्‍तान को अपने नियंत्रण में लिया था तब भी पंजशीर घाटी पूरी तरह से मुक्‍त और आजाद थी। हालांकि इस बार यहां के हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। तालिबान पहले से ज्‍यादा सुदृढ़ हुआ है।

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    अफगानिस्‍तान की यह घाटी तालिबान कब्‍जे से मुक्‍त। फाइल फोटो।

    काबुल, एजेंसी। अफगानिस्‍तान की राजधानी काबुल पर तालिबान का पूरी तरह से कब्‍जा हो चुका है, लेकिन यहां से 125 किलोमीटर दूर पंजशीर घाटी अभी भी तालिबान प्रभाव से मुक्‍त है। अफगानिस्‍तान का यह क्षेत्र तालिबान के प्रभुत्‍व से बाहर है। अफगानिस्‍तान की पंजशीर घाटी लंबे समय से तालिबान हुकूमत के विरोध का गढ़ रहा है। पूर्व सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहिदीन नेता अहमद शाह मसूद ने इसी घाटी को अपना गढ़ बनाया था। दो दशक पूर्व तालिबान ने जब अफगानिस्‍तान को अपने नियंत्रण में लिया था, तब भी पंजशीर घाटी पूरी तरह से मुक्‍त और आजाद थी। हालांकि, इस बार यहां के हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। तालिबान पहले से ज्‍यादा सुदृढ़ हुआ है। इसलिए पंजशीर की आजादी पर सवाल उठ रहे हैं। यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्‍या तालिबानियों का मुकाबला कर पाएंगे। 

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    मसूद के बेटे अहमद मसूद ने तालिबान के विरोध में झंडा उठाया

    पंजशीर घाटी में अब अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद ने तालिबान के विरोध में झंडा उठाया है। हालांकि, मसूद के पास अपने पिता की विरासत के अलावा और कोई बड़ी पहचान नहीं हैं। अफगानिस्‍तान के उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने भी यहीं शरण ले रखी है। पश्चिमी और तालिबान विरोधी सरकारों के साथ निकट संबंध रखने वाले मसूद के साथ मिलकर तालिबान के खिलाफ गठजोड़ खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, यह माना जा रहा है कि पंजशीर में तालिबान को बहुत ज्यादा देर तक टक्कर नहीं दे पाएगा। इसका एक कारण यह भी है कि तालिबान ने पंजशीर में घुसने की कोशिश नहीं की है।

    पंजशीर को क्‍या अंतरराष्‍ट्रीय बिरादरी की मिलेगी मदद

    उधर, सालेह ने तालिबान के खिलाफ बन रहे गुट की मदद करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से अपील की है। अमेरिकी सीआइए अमेरिका की सुरक्षा परिषद से जुड़े रहे रक्षा विश्लेषक पाल डी मिलर कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि पंजशीर तालिबान को पंजशीर घाटी के बाहर किसी तरह की कोई चुनौती दे पाएगा। अलबत्‍ता यह हो सकता है कि वह अपनी स्‍वात्‍तता बरकरार रखने में कामयाब हो जाए। उन्‍होंने कहा कि यदि पंजशीर के लोग अपना विरोध कायम रख पाते हैं, तो यह हो सकता है उन्हें कम दर्जे का अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल जाए ताकि अफगानिस्तान में अल-कायदा और दूसरे आतंकवादी समूहों पर नजर रखी जा सके।

    तालिबान से मुकाबला करने में अक्षम है पंजशीर

    प्रो हर्ष पंत का कहना है कि पंजशीर में अब उतनी क्षमता नहीं है कि वह तालिबान का मुकाबला कर सके। वह अपनी रक्षा कर सके। उन्‍होंने कहा कि तालिबान 1990 के दशक से ज्‍यादा मजबूत रूप से सामने आया है। कई देशों ने उसको कूटनीतिक मान्‍यता देने का संकेत दिए हैं। पंत ने कहा कि इस समय तालिबान के पास ब्लैकहॉक हेलिकॉप्टर समेत भारी अमेरिकी हथियार हैं। पाकिस्तानी भी निश्चित तौर पर तालिबान की मदद करेंगे। पंजशीर टिका रहा, क्योंकि उसे बहुत हद तक भारत, ईरान, तजाकिस्तान और कुछ मौकों पर अमेरिका का समर्थन प्राप्त था, लेकिन अब अफगानिस्तान के तालिबान के कब्जे में आ जाने के बाद हालात बहुत हद तक बदल गए हैं। अब चीन और रूस जैसे देश तालिबान के साथ हैं।