नई दिल्‍ली (ऑनलाइन डेस्‍क)। ‘बोस्निया का कसाई' के नाम से चर्चित सर्बियाई पूर्व जनरल और नेता रात्को म्लादिच एक बार फिर से अंतरराष्‍ट्रीय मीडिया की सुर्खिया बना हुआ है। इसकी वजह संयुक्‍त राष्‍ट्र अपराध ट्राइब्‍यूनल का वो फैसला है जिसमें उसकी सजा को कम किए जाने की अपील को खारिज कर दिया गया है। बेल्जियम के वकील और इंटरनेशनल रेजिड्यूअल मकैनिजम फॉर क्रिमिनल ट्राइब्यूनल्स के मुख्य वकील सर्गे ब्रामेअर्त्स ने फैसले पर खुशी जताई है। उनका कहना है कि अब इस कसाई के पास आगे अपील की कोई गुंजाइश नहीं बची है। ये कोर्ट का आखिरी फैसला है।

रात्‍को का जिक्र आते ही आज भी बोस्निया में लोगों के चेहरे डर के मारे पीले पड़ जाते हैं। ये वो शख्‍स है जिसको वहां पर आठ हजार लोगों के नरसंहार का दोषी माना गया था और उसको उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इस नरसंहार के लिए सर्बियाई राष्‍ट्रपति स्लोबोदान मीलोसेविच और सर्ब नेता रादोवान कराद्जिक पर भी मुकदमा चलाया गया था। द इंटरनेशनल क्रिमिनल टाइब्‍यूनल फॉर द फॉर्मर युगोस्‍लाविया (आईसीटीवाई) ने म्‍लादिच को 40 वर्ष की सजा सुनाई थी जबकि मिलोसेविक की ट्रायल के दौरान ही मौत हो गई थी। म्‍लादिच ने निहत्‍थे लोगों पर गोलियां चलवाई थी।

1992 में इस घटना की शुरुआत एक जनमत संग्रह से हुई थी। इसमें जहां बोस्निया और क्रोएशिया के नागरिकों ने आजादी के पक्ष में अपना मत दिया था वहीं सर्ब लोगों ने इसके खिलाफ वोट दिया था। आजादी चाहने वालों का मुंह बंद करने के लिए म्‍लादिच ने सेना का सहारा लिया। हजारों लोगों के घरों को जला दिया गया और अन्‍य लोगों को डराने के मकसद से हिरासत में लिए गए लोगों पर अत्‍याचार के वीडियो बनाए गए और लोगों को इन्‍हें दिखाया गया था।

इस नरसंहा की घटना के बाद म्‍लादिच काफी समय तक फरार रहा था। वर्ष 2011 में उसको गिरफ्तार करने में सफलता हाथ लगी थी। वो अंतरराष्ट्रीय युद्ध अरपराध ट्राइब्यूनल का मोस्ट वॉन्टेड भी था। 15 वर्षों तक वो पुलिस की आंखों में धूल झोंकने में इस वजह से कामयाब हो सका था क्‍योंकि वो सर्बियाई राष्ट्रवादियों की निगाह में एक हीरो की तरह था। उसने देश की राजनीति को काफी हद तक प्रभावित किया था।

2000 तक भी वो खुलेआम अपने समर्थकों के बीच बेलग्रेड में घूमता था। इसकी वजह कहीं न कहीं यूगोस्‍लाविया के पूर्व राष्‍ट्रपति स्लोबोदान मीलोसेविच को माना जाता है। उसने ही म्‍लादिच को सुरक्षा घेरा प्रदान किया था। उसकी गिरफ्तारी के पीछे भी बेहद दिलचस्‍प कहानी है। दरअसल उसकी गिरफ्तारी सर्बिया के लिए अंतरराष्‍ट्रीय संगठनों का हिस्‍सा बनने की सबसे बड़ी शर्त म्‍लादिच की गिरफ्तारी ही थी। इसके अलावा यूरोपीय संघ का सदस्‍य बनने के लिए भी उसको इस शर्त को पूरा करने की जरूरत थी।

जनरल म्लादिच के आदेश पर जुलाई 1995 में सर्ब सेना ने आठ हजार से ज्यादा बोस्नियाक मुसलमानों का बड़ी ही निर्दयता से कत्‍ल कर दिया था। इसमें हर उम्र के पुरुष शामिल थे। छोटे बच्‍चों को भी इस कत्‍लेआम में नहीं बख्‍शा गया था। वर्ष 2017 में अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्राइब्यूनल ने म्लादिच को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बोस्निया-हर्जेगोविना के राष्ट्रपति मिलोराद डोडिच ने इस नरसंहार को जातिसंहार मानने से इनकार कर दिया था। गौरतलब है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से यूरोप में हुआ ये सबसे बड़ा नरसंहार का मामला था। संयुक्‍त राष्‍ट्र ने आरोपों के तहत म्लादिच को ही इस नरसंहार का मास्टरमाइंड मानते हुए दोषी ठहराया था।

आपको बता दें कि बोस्निया का युद्ध अप्रैल 1992 से दिसंबर 1995 तक चला था। इसमें करीब 1 लाख से अधिक लोग मारे गए थे। मारे गए लोगों में अधिकतर बोस्नियाक मुसलमान थे। इस युद्ध को रोकने में अमेरिका ने बड़ी भूमिका निभाई थी। इसके परिणामस्‍वरूप आहायो में विभिन्न पक्षों में एक समझौता हुआ था जिस पर अंतिम मुहर पेरिस में लगी थी। इसको इतिहास में जनरल फ्रेमवर्क अग्रीमेंट फॉर पीस इन बोस्निया एंड हर्जेगोविना नाम से जाना जाता है। पेरिस मे इस समझौते पर दस्तखत के साथ ये युद्ध खत्म हो गया था।

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