काठमांडू, एएफपी। काठमांडू में बुधवार को गाय जात्रा फेस्टिवल के मौके पर कोविड-19 का असर तो दिखा लेकिन त्योहार को मनाने के लिए पहले की तरह ही लोग यात्रा में शामिल हुए। बच्चों ने मास्क के साथ पारंपरिक गाय व विभिन्न कास्ट्यूम्स पहन यात्रा में हिस्सा लिया। यह त्योहार 17वीं सदी से मनाया जाता रहा है। इसके जरिए परिजनों के निधन के बाद वाले साल में इस त्योहार के जरिए सम्मान और श्रद्धांजलि दी जाती है।

गाय की कॉस्ट्यूम में बच्चे

परंपरागत रूप से अगर किसी की मौत हो जाती थी तो उसके परिजन अगले साल एक गाय को लेकर इस यात्रा में हिस्सा लेते थे। अगर किसी के पास गाय नहीं होती  तो किसी बच्चे को गाय की तरह सजाया जाता था। अभी भी लोग बच्चों को तरह-तरह के कपड़े पहनाकर इस यात्रा में शामिल होते हैं।  गाय जात्रा का अर्थ है- गायों का फेस्टिवल। इस त्योहार में लोग विशेषकर बच्चे अलग अलग पारंपरिक कॉस्ट्यूम्स में एक यात्रा में शामिल होते हैं। इस दौरान परंपरागत बैंड भी होता है। यह त्योहार मुख्यत: तीन जिलों काठमांडू, ललितपुर और भक्तापुर में मनाए जाते हैं।

मल्ला राजवंश में हुई थी शुरुआत

इस त्योहार का नाम हिंदू धार्मिक मान्यताओं से लिया गया है। ऐसा माना जाता है कि स्वर्ग जाते हुए मृतकों को एक नदी पार करनी होती है जो वे गाय का पूंछ पकड़ कर पार करते हैं। तत्कालीन मल्ला राजवंश  (Malla dynasty) के राजा प्रताप मल्ला ( Pratap Malla) ने अपनी रानी को सांत्वना देने के लिए इस त्योहार की शुरुआत की थी। दरअसल, रानी अपने पुत्र की मौत से शोकाकुल थीं और इस त्योहार से राजा उन्हें दिखाना चाहते थे कि परिजनों को खोने वाले उन जैसे अनेकों लोग हैं। 

राजा प्रताप मल्ल के पुत्र की मौत के बाद उनकी पत्नी काफी दुखी थीं और लाखों जतन के बाद भी वे प्रसन्न नहीं हुई न ही उनके चेहरे पर मुस्कुराहट आई। इसके बाद ही राजा ने आदेश दिया कि जो रानी को हंसाएगा उसे पुरस्कृत किया जाएगा। इसके बाद ही गाय जात्रा निकाली गई जिसमें शामिल लोगों ने तरह-तरह के स्वांग किए जिससे रानी के चेहरे पर मुस्कान आई और वे इस बात को समझ सकीं की मौत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और इस पर किसी का वश नहीं है।

 

Posted By: Monika Minal

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