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इमिग्रेशन, अर्थव्यवस्था और अमेरिका-भारत संबंध... मिडटर्म चुनाव से पहले INDO-US वोटर्स के मन में क्या है?

Published: Tue, 03 Nov 2026 04:24 PM (IST)Updated: Tue, 03 Nov 2026 05:41 PM (IST)

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों से पहले भारतीय-अमेरिकी मतदाता अप्रवासन, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय नीतियों पर ट्रंप प्रशासन से असंतुष्ट दिख रहे हैं।

HighLights

  1. अप्रवासन नीतियों पर ट्रंप से भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं में असंतोष।

  2. घरेलू अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों पर चिंताएं बढ़ीं।

  3. अमेरिका-भारत संबंधों पर ट्रंप के रवैये से भी नाराजगी।

डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। भले ही अमेरिकी आबादी में भारतीय-अमेरिकियों की हिस्सेदारी सिर्फ 1.5 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनावों से पहले उनकी राजनीतिक पसंद पर सबका ध्यान जा रहा है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी के सबसे भरोसेमंद समर्थकों में से एक रहा है। रिपब्लिकन पार्टी की ओर झुकाव बढ़ने के एक दौर के बाद, अब यह समुदाय फिर से तरह से डेमोक्रेट्स की तरफ लौटना दिख रहा है।

इमिग्रेशन, घरेलू अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीति और अमेरिकी-भारत संबंधों की स्थिति, इन सभी मुद्दों को लेकर भारतीय-अमेरिकियों में ट्रंप के प्रति असंतोष है। ये चिंताएं अमेरिकी समाज में भारतीय-अमेरिकियों की जगह को लेकर चल रही एक व्यापक बहस के बीच सामने आई हैं, जिससे इस समुदाय से सामने मौजूदा राजनीतिक विकल्प और भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।

इमिग्रेशन

भारतीय-अमेरिकियों के लिए इमिग्रेशन नीति का एक बहुत ही व्यक्तिगत पहलू भी है, खासकर उन पेशेवरों के लिए जो रोजगार-आधारिक वीजा पर अमेरिका आए हैं। भारतीय तकनीकी कर्मचारियों के बीच काफी प्रचलित H-1B प्रोग्राम, कुशल प्रवासियों के लिए अमेरिका आने का एक अहम जरिया है।

वर्क वीजा के लेकर अनिश्चितता, नियोक्ता बदलने की सुविधा, वीजा का नवीनीकरण और स्थायी निवास के लिए लंबा इंतजार, ये सब न केवल किसी व्यक्ति के करियर, बल्कि पूरे परिवार पर असर डाल सकते हैं। इसलिए, इस व्यवस्था में किसी भी तरह की सख्ती का असर सिर्फ सीमाओं की सुरक्षा तक ही सीमित नहीं रहता।

कुशल प्रवासियों के प्रति ट्रंप के सख्त रुख ने इस समुदाय में खलबली मचा दी है। H-1B वीजा को लेकर उनके प्रशासन के कदमों, जिसमें अमेरिका के बाहर से आवेदन करने वाले कुछ कर्मचारियों के लिए 100,000 डॉलर के भुगतान की विवादास्पद शर्त भी शामिल है, ने नियोक्ताओं, तकनीकी पेशेवरों और अमेरिका जाने के इच्छुक लोगों के बीच चिंता पैदा कर दी है।

ज्यादा खर्च और सख्त पाबंदियों की संभावना ने इस डर को भी जन्म दिया है कि अमेरिकी कंपनियां अब विदेशों से प्रतिभाओं को काम पर रखने में कम दिलचस्पी ले सकती हैं।

अर्थव्यवस्था

ट्रंप प्रशासन से असंतोष का एक और बड़ा कारण आर्थिक प्रदर्शन है। भारतीय-अमेरिकियों के लिए, और पूरे अमेरिका के मतदाताओं के लिए, घरेलू अर्थव्यवस्था राष्ट्रपति के कामकाज को आंकने का एक महत्वपूर्ण पैमाना है।

कार्नेगी के सर्वेक्षण से पता चला है कि 68% भारतीय-अमेरिकी, घरेलू आर्थिक नीति को संभालने के ट्रंप के तरीके से असंतुष्ट हैं। इसमें महंगाई, टैक्स और सरकारी खर्च जैसे मुद्दे शामिल हैं। आर्थिक नीति कोई ऐसा सीमित विषय नहीं है जो समाज के केवल एक हिस्से को प्रभावित करता हो। यह इस बात का एक व्यापक पैमाना है कि मतदाता, रोजमर्रा की अपनी आर्थिक स्थितियों को संभालने की प्रशासन की क्षमता का आकलन कैसे करते हैं।

अर्थव्यवस्था, रिपब्लिकन पार्टी के लिए उन समर्थनों को बनाए रखने की कोशिशों को भी मुश्किल बनाती है, जो उन्हें 2024 में भारतीय-अमेरिकियों के बीच मिले थे। समाज के कुछ वर्गों के बीच ट्रम्प का प्रभाव एक बड़े बदलाव का हिस्सा था, जिसने डेमोक्रेट्स की पारंपरिक बढ़त को कम कर दिया था। लेकिन उनके प्रशासन के आर्थिक प्रबंधन से असंतोष ने, इन लाभों को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलने की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है।

ट्रेड एंड टैरिफ

अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीति एक और ऐसा क्षेत्र है, जहां भारतीय-अमेरिकियों के बीच ट्रम्प को काफी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कार्नेगी के सर्वेक्षण में पाया गया कि 70% लोग अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नीति, जिसमें व्यापार, शुल्क और प्रतिबंध शामिल हैं, को संभालने के उनके तरीके से असंतुष्ट हैं। सर्वेक्षण में शामिल तीन प्रमुख नीतिगत क्षेत्रों में, यह असंतोष का सबसे ऊंचा आंकड़ा था।

ऐसे समुदाय के लिए, जिसके राष्ट्रीय सीमाओं के पार मजबूत पेशेवर, व्यावसायिक और पारिवारिक संबंध हैं, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक फैसलों के परिणाम केवल राजनयिक असहमति से कहीं आगे तक जा सकते हैं। व्यापार नीति, शुल्क और प्रतिबंध, अमेरिका और बाकी दुनिया के बीच व्यापक आर्थिक संबंधों का हिस्सा हैं। ये उस माहौल को भी प्रभावित करते हैं, जिसमें व्यवसाय, पेशेवर और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियां काम करती हैं।

यह निष्कर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि ट्रंप से असंतोष केवल घरेलू आर्थिक प्रबंधन या इमिग्रेशन तक सीमित नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रति उनके प्रशासन के दृष्टिकोण का विरोध उस समुदाय के भीतर भी हो रहा है, जिसके पारंपरिक रूप से मजबूत अंतराष्ट्रीय संबंध रहे हैं।

2024 में भारतीय-अमेरिकियों के बीच रिपब्लिकन पार्टी को मिली बढ़त यह दिखाती है कि यह समुदाय ट्रंप के आर्थिक और राजनीतिक संदेशों के प्रभाव से अछूता नहीं था। लेकिन ताजा निष्कर्ष बताते हैं कि उन लाभों को बनाए रखना मुश्किल साबित हुआ है।

अमेरिका-भारत संबंध

अमेरिका-भारत संबंधों की स्थिति एक और ऐसा मुद्दा है जो भारतीय-अमेरिकियों के बीच राजनीतिक माहौल को प्रभावित कर रहा है, हालांकि चुनावी दृष्टि से इसके महत्व को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए।

कई सालों तक, वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच मजबूत होते संबंधों को भारतीय-अमेरिकी समुदाय के कई लोगों ने सकारात्मक रूप में देखा। यह रिश्ता भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और अमेरिका में भारतीय प्रवासियों की बढ़ती राजनीतिक मौजूदगी की व्यापक चर्चा का एक अहम हिस्सा बन गया था। लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने इस रिश्ते में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है।

कार्नेगी सर्वे से पता चला है कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय के एक बड़े हिस्से ने अमेरिका-भारत संबंधों को लेकर ट्रंप के रवैये को नापसंद किया है, जबकि कभी यही उनके लिए एक मजबूत पक्ष हुआ करता था। यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत के मामले में राष्ट्रपति के कामकाज को लेकर इस समुदाय की राय, इमिग्रेशन और आर्थिक नीतियों को लेकर उनकी सोच के साथ-साथ और खराब हुई है।

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने वाली है। अक्टूबर 2026 के सर्वे में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मतदाताओं के लिए सबसे अहम चुनावी मुद्दों में अमेरिका-भारत संबंध किस स्थान पर आते हैं। यह सर्वे केवल यह बताता है कि लोग दोनों देशों के संबंधों को लेकर प्रशासन के कामकाज से असंतुष्ट हैं; इसका मतलब यह नहीं है कि विदेश नीति ही कांग्रेस के चुनावों में वोट डालने का सबसे निर्णायक कारक है।

सर्वे में यह भी कहा गया है कि भले ही भारतीय-अमेरिकी समुदाय दोनों देशों के बीच के संबंधों की दिशा को लेकर चिंतित हो, लेकिन उनके चुनावी फैसले केवल इस बात पर निर्भर नहीं करते कि वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच क्या हो रहा है।

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