जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच होने वाला था परमाणु युद्ध, हॉटलाइन संचार से कैसे टला WW 3 का खतरा?
क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव चरम पर था जिससे विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा था। गलतफहमी से बचने और तत्काल संचार स्थापित करने के लिए 20 जून 1963 को दोनों देशों के बीच हॉटलाइन संचार की स्थापना हुई। इस हॉटलाइन ने न सिर्फ परमाणु युद्ध के खतरे को टाल दिया बल्कि तीसरे विश्व युद्ध की संभावना भी खत्म कर दी थी।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अक्टूबर 1962... अमेरिका और सोविय संघ के बीच शीतयुद्ध अपने चरम पर था। इसी बीच सोवियत संघ ने अमेरिका के पास मौजूद क्यूबा में परमाणु मिसाइल तैनात कर दिए। इस घटना से पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया। अमेरिका भी तुंरत एक्टिव हो गया। सबको लगा अब दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध होकर रहेगा।
क्यूबा मिसाइल संकट को शीत युद्ध का चरम समय माना जाता है। इस दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच 13 दिनों तक टकराव चला, जिसके बाद दोनों देशों के बीच हॉटलाइन संचार शुरू हुआ।
क्यों हुई हॉटलाइन संचार की स्थापना?
20 जून 1963 को अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हॉटलाइन संचार की स्थापना हुई। हॉटलाइन संचार एक सीधा संचार लिंक था, जो वाशिंगटन और मॉस्को को जोड़ता था।
दरअसल क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान जब दुनिया पर तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा था, तब अमेरिका ने सोवियत संघ को समझौते का मैसेज भेजा, जिसे पहुंचने में 12 घंटे का समय लगा। सभी को डर था कि कहीं मैसेज पहुंचने से पहले रूस अमेरिका पर परमाणु हमला न कर दे।
तीसरा विश्व युद्ध टला
आखिर में दोनों देशों ने युद्ध न करने का फैसला लिया। क्यूबा मिसाइल संकट का एक बड़ा कारण दोनों देशों के बीच संपर्क स्थापित न होना भी था। इससे सबक लेते हुए अमेरिका और सेवियत संघ के नेताओं ने जेनेवा में मुलाकात की और दोनों देशों के बीच हॉटलाइन स्थापित करने पर सहमति बनी।
हॉटलाइन संचार कैसे करता था काम?
यह हॉटलाइन कोई फोन का कनेक्शन नहीं था, बल्कि यह एक टेलीटाइपलाइन थी, जो केबल की मदद से चलती थी। यह केबल अटलांटिक महासागर की गहराई में बिछाई गई थी। टेलीटाइप से दोनों देशों एक-दूसरे को संदेश भेजते और फिर यह संदेश अपनी भाषा में ट्रांसलेट करके पढ़ा जाता था। बाद में यह टेलीटाइप सैटेलाइट से चलने लगा।
दोनों देशों में बढ़ी बातचीत
इस हॉटलाइन संचार का मकसद दोनों देशों के बीच बातचीत का संपर्क स्थापित करना था, जिससे गलफहमियां पैदा न हों और दोनों देश तीसरे विश्वयुद्ध को टाल सकें।
मिडिल ईस्ट में तनाव से लेकर वैश्विक मुद्दों पर बातचीत करने के लिए अमेरिका और सोवियत संघ ने दशकों तक इसी हॉटलाइन का इस्तेमाल किया। यह दर्शाता है कि बड़े से बड़े मसले को बातचीत से हल किया जा सकता है।
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