यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 07, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सीरिया को पूरी तरह से खाली नहीं करेंगी अमेरिकी फौज, क्या है ट्रंप की पॉलिसी
अमेरिका के रक्षा जानकारों की निगाह में मिडिल ईस्ट और खासकर सीरिया को लेकर डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से ही कंफ्यूज्ड रहे हैं।

नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। सीरिया और मिडिल ईस्ट को लेकर अमेरिका असमंजस में फंसा हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ ही दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया से अपनी फौज को वापस बुलाने की बात कही थी। इसके साथ ही उन्होंने सीरिया से आईएस का पूरी तरह से खात्मा होने तक अमेरिकी सेना के करीब दो हजार जवानों को सीरिया में ही तैनात रखने की भी बात कही थी। ट्रंप के इसी फैसले ने रक्षा जानकारों की निगाह में कंफ्यूज्ड बना दिया है। आपको बता दें कि कुछ दिन पहले ट्रंप द्वारा अमेरिकी फौज को वापस बुलाने की घोषणा के बावजूद इस बात का खुलासा नहीं किया गया था यह कब से होगा और कब तक फौज को वापस बुला लिया जाएगा। न ही इसका कोई प्लान बताया गया था जिससे यह साफ हो पाता कि आखिर कितने दिनों तक ऐसा चलता रहेगा और उनकी आखिर रणनीति क्या है। अमेरिकी रक्षा विभाग के पूर्व रक्षा विश्लेषक माइकल मालूफ मिडिल मानते हैं कि मिडिल ईस्ट और खासकर सीरिया को लेकर अमेरिका पूरी तरह से कंफ्यूज्ड है कि क्या किया जाए और क्या नहीं।
सऊदी अरब-अमेरिकी गठजोड़
माइकल की निगाह में अमेरिका और सऊदी अरब का साथ आना कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। दरअसल अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ 180 स्वत: संचालित हथियार प्रणाली के समझौते को मंजूरी दे दी है। 1.31 अरब डॉलर के इस समझौते को दुनिया का सबसे बड़ा हथियार सौदा बताया जा रहा है। पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सऊदी अरब यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 110 अरब डॉलर का समझौता हुआ था। अब उसे बढ़ाकर 1.31 अरब डॉलर कर दिया गया है। यह इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि सीरिया में हमला करने वालों सऊदी अरब भी शामिल है।
सीनेट हमेशा रही है खिलाफ
माइकल का कहना है कि सीरिया की सरकार ने आईएस और विद्रोही गुटों के खिलाफ लड़ने के लिए ईरान और रूस की सेना को अपने यहां बुलाया था। लेकिन अमेरिका को सीरिया ने नहीं बुलाया। इसके बाद भी अमेरिका ने वहां पर न सिर्फ अपनी फौज भेजी बल्कि हमले भी किए। अमेरिकी सरकार द्वारा किए गए इस निर्णय का साथ अमेरिकी सीनेट ने भी कभी नहीं दिया है। वह भी हमेशा से ही इसके खिलाफ रही है। हालांकि ट्रंप ने फौजों की वापसी का जो फैसला लिया है वह वादा उन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में किया था। अब वह उसको ही पूरा भी कर रहे हैं।
दोबारा विचार करने की जरूरत
माईकल ही नहीं सीरिया में पूर्व अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट फोर्ड भी मानते हैं कि अमेरिकी फौज को कम समय के लिए तो सीरिया में रखने के बारे में सोचा जा सकता है लेकिन जो कोई लंबे समय के लिए यहां रहना चाहता है उसको अपने फैसले पर दोबारा गौर करना चाहिए। खुद ट्रंप भी इस बात को कह चुके हैं कि वह अमेरिका में जहां भी गए वहां किसी ने भी इस बात को नहीं कहा कि सीरिया में अमेरिकी फौज का रहना चाहिए। लेकिन उन्होंने भी हाल ही में जिस तरह से अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर को फायर किया है उसके भी कुछ अलग मायने हैं। यह दोनों जानकार मानते हैं जापान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी में अमेरिकी फौज करीब साठ वर्षों से काबिज है। लेकिन जो कोई भी सीरिया में अमेरिकी फौज की मौजूदगी को सही बताता उसको यह सोचना चाहिए कि अमेरिका को सीरिया में मानवीय आधार पर मदद करनी चाहिए।
अवाद ने भी किया था जिक्र
यहां ये भी ध्यान रखने वाली बात है कि जिन चीजों का जिक्र माइकल और फोर्ड ने किया है उनका जिक्र सीरियाई पत्रकार डॉक्टर वईल अवाद ने भी दैनिक जागरण से बात करते हुए किया था। उनका कहना था कि सीरिया में अमेरिका ने अवैध रूप से अपने मिलिट्री बेस बनाए हुए हैं और वह लगातार विद्रोहियों और आतंकियों को ट्रेनिंग और हथियार दे रहा है। हालांकि ट्रंप के फौज को वापस बुलाने के फैसले को लेकर उन्होंने खुशी का इजहार करते हुए उम्मीद जताई थी कि इससे सीरिया में शांति स्थापित होने की उम्मीद है। उनका यह भी कहना था कि सीरिया में हालात पर काबू पाने के लिए वहां की सरकार ने रूसी सेना को अपने यहां आमंत्रित किया था लेकिन अमेरिका को नहीं किया था।
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