टेनेसी (अमेरिका), एएनआइ। हकलाने वाले लोगों की समस्या दूर करने की दिशा में एक शोध ने आशा की किरण जगाई है। वेंडरबिल्ड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर (वीयूएमसी) और वेन स्टेट यूनिवर्सिटी की शोधकर्ताओं ने पाया है कि हकलाने की स्थिति आनुवंशिक विविधताओं से जुड़ा है। इस संबंध में शोधकर्ता जेनिफर पाइपर बिलो और शेली जो क्राफ्ट ने जीन संरचना का विश्लेषण किया है। यह अध्ययन 'द अमेरिकन जर्नल आफ ह्यूमन जीनेटिक्स' और 'ह्यूमन जीनेटिक्स एंड जीनोमिक्स एडवांसेज' जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस अध्ययन से हकलाने का इलाज खोजने में मदद मिल सकती है।

वीयूएमसी में मेडिसिन की एसोसिएट प्रोफेसर बिलो ने बताया कि इतना तो साफ है कि हकलाने वाले लोग पोलीजेनिक होते हैं। मतलब यह कि ऐसे विभिन्न आनुवंशिक कारक हैं, जो हकलाने के जोखिम या उसे रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह बात इस अध्ययन से पहले कभी सामने नहीं आई थी।

वेन स्टेट यूनिवर्सिटी में कम्यूनिकेशन साइंसेज एंड डिसआर्डर की प्रोफेसर तथा बिहेवियर, स्पीच एंड जीनेटिक्स लैब की निदेशक क्राफ्ट के मुताबिक, इस रहस्योद्घाटन से हकलाने वाले लोगों और उनके माता-पिता को बड़ी राहत मिलने की आशा जगी है। इस शोध के जरिये यह समझ सकेंगे कि वे बोलने में जीवनभर क्यों खुद को अलग महसूस करते हैं।

कैसे किया अध्ययन

शोधकर्ताओं ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर आयरलैंड, इंग्लैंड, इजराइल, स्वीडन, आस्ट्रेलिया तथा अमेरिका में हकलाने वाले 1800 लोगों के खून और लार के सैंपल जुटाए। ये लोग 250 से ज्यादा परिवारों की तीन पीढि़यों के थे। इसके पहले भी हकलाने को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन हुआ था और उसमें हकलाने के बढ़ने से संबंधित नए आनुवंशिक भिन्नताओं का पता लगाया गया था। लेकिन वह स्थिति की जटिलताओं को लेकर था। साथ ही उसमें इतने बड़े पैमाने पर लोगों को शामिल नहीं किया गया था।

हकलाना एक ऐसी विकृति है, जिसके लिए न तो कोई डायग्नोस्टिक कोड दिए गए हैं और न ही उसके लिए लोगों को अस्पताल में भर्ती किया जाता है। बिलो ने बताया कि इन्हीं कारणों से उनकी टीम ने इस मिसिंग कोड को पाने की एक नई कोशिश की। शोधकर्ताओं ने हकलाने की बढ़ती गतिविधियों के पुष्ट मामलों के माध्यम से डायग्नोस्टिक कोड का एक समूह बनाया, जिसमें ध्यान भटकने के अटेंनशन डिफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर (एडीएचडी) और आटोइम्यून प्रतिक्रिया को भी शामिल किया गया। यह प्रतिक्रिया हकलाने के साथ ज्यादा बढ़ती है।

इसके बाद, मशीन लर्निग तकनीक के इस्तेमाल से एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल भी तैयार किया, जिससे हकलाने के जोखिम का आकलन किया जा सकता है। इसके जरिये हकलाने के जोखिम का 80 प्रतिशत तक सकारात्मक अनुमान लगाया जा सका।

शोधकर्ताओं ने हकलाने से जुड़े जीन का आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर और हार्मोन से जुड़े असर की भी जांच की। इससे भविष्य में यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि लड़के क्यों ज्यादा हकलाते हैं और लड़कियों में यह विकृति ठीक होने की संभावना अधिक क्यों होती है। हालांकि लक्षणों के बीच कुछ संबंध गलत भी हो सकते हैं।

बिलो के मुताबिक, लेकिन शोधकर्ता यदि आगे चलकर हकलाने और एडीएचडी जैसे लक्षणों के बीच आनुवंशिक संबंध स्थापित कर लेते हैं तो इन दोनों ही विकारों के इलाज के लिए एकसाथ विकल्प मिल सकता है।