बोस्टन, प्रेट्र। वैज्ञानिकों ने बिच्छू के जहर में मौजूद रंग बदलने वाले दो यौगिकों का पता लगाया है, जिससे जीवाणु (बैक्टीरिया) संक्रमण से लड़ने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह एक ऐसी दवा सिद्ध हो सकती है जहां दवाओं का असर लगभग समाप्त हो जाता है।

अमेरिका की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मेक्सिको और स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पूर्वी मेक्सिको में पाई जाने वाली बिच्छू की प्रजाति के ही ‘डिप्लोमेंट्रस मेलिसी’ के जहर से इन यौगिकों को अलग करने में कामयाबी हासिल की है। शोधकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने इन यौगिकों का चूहों में प्रयोग किया और पाया कि इससे दवा प्रतिरोध ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया भी मर सकते हैं।

प्रोसीडिंग ऑफ द नेशनल एकेडमी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि बिच्छू, सांप, घोंघे और अन्य जहरीले जीवों के जहर में भी औषधीय खजाना हो सकता है। शोधकर्ताओं की टीम का नेतृत्व करने वाले रिचर्ड जार ने कहा कि घनत्व के नजरिए से देखें तो बिच्छू का जहर विश्व में सबसे कीमती माना जाता है। इस जगह के एक गैलिन की कीमत लगभग 3.9 करोड़ रुपये है। उन्होंने कहा कि यदि आप इसका उत्पादन करने के लिए केवल बिच्छू पर निर्भर रहते हैं तो कोई भी इसे खरीद नहीं सकता, इसलिए यह जानना महत्वपूर्ण है क्या इसका कृत्रिम तरीके से उत्पादन किया जा सकता है। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मैक्सिको के प्रोफेसर लोवरिवल पोसानी ने कहा कि बिच्छू की इस प्रजाति का संग्रह मुश्किल है क्योंकि सर्दियों और शुष्क मौसमों के दौरान, बिच्छू दुबके रहते हैं। केवल बारिश के मौसम में ही इसे देखा जा सकता है।

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Posted By: Manish Pandey