Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    बंगाल में हर साल सामने आ रहे टीबी के एक लाख से अधिक मामले, कोलकाता सबसे ज्यादा प्रभावित

    Updated: Mon, 24 Mar 2025 06:19 PM (IST)

    पश्चिम बंगाल में टीबी के मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा देखने को मिल रहा है। हर साल बंगाल में एक लाख से अधिक टीबी के मरीज सामने आ रहे हैं। पूरे राज्य में कोलकाता सबसे अधिक प्रभावित है। जानकारों का मानना है कि बंगाल के विभिन्न जिलों में टीबी के मामले देखे जाने के अपने-अपने कारण हैं। बीरभूम में भी बड़ी संख्या में लोग टीबी के शिकार हैं।

    Hero Image
    बंगाल में लगातार बढ़ रहे टीबी के मरीज। (सांकेतिक तस्वीर)

    विशाल श्रेष्ठ, जागरण, कोलकाता। कोलकाता के पार्क स्ट्रीट इलाके के रहने वाले 26 वर्षीय सुदेश शर्मा (परिवर्तित नाम) का वजन अचानक काफी घट गया। पहले लगा कि काम के दबाव के कारण समय पर खाना-पीना नहीं हो पाने के कारण ऐसा हुआ है, लेकिन जब काफी समय तक स्थिति में सुधार नहीं हुआ और टेस्ट कराया गया तो पता चला कि उन्हें क्षय रोग यानी ट्यूबरक्यूलोसिस (टीबी) हुआ है।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    हावड़ा के सलकिया इलाके के निवासी 46 साल के मोहन गुप्ता (परिवर्तित नाम) को रात के वक्त काफी पसीना आता था। टेस्ट कराने पर उनका भी टीबी का मामला निकला। इसी तरह बंगाल में हर साल टीबी के एक लाख से अधिक मामले सामने आ रहे हैं। 2024 में राज्य में 99,780 अधिसूचित (नोटिफाइड) मामले दर्ज हुए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गैर-अधिसूचित मामलों को जोड़ दिया जाए तो बंगाल में टीबी के मरीजों की तादाद कहीं अधिक है।

    कोलकाता में दर्ज हुए सबसे ज्यादा मामले

    अकेले कोलकाता में पिछले साल 13,470 मामले दर्ज हुए हैं। मुर्शिदाबाद दूसरा सबसे प्रभावित जिला है, जहां 8,139 मामले देखे गए हैं। उत्तर 24 परगना (7,058) पूर्व बद्र्धमान (6,680), मालदा (5,732), हुगली (5029), पश्चिम मेदिनीपुर (4,310), हावड़ा (4,001) और बीरभूम (2,448) जिले भी चिंताजनक तस्वीरें पेश कर रहे हैं।

    क्यों बढ़ रहे टीबी के मामले?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ)-भारत के राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के मेडिकल कंसल्टेंट डॉ. रजत बसु ने बताया कि बंगाल के विभिन्न जिलों में टीबी के मामले देखे जाने के अपने-अपने कारण हैं। मुर्शिदाबाद में ज्यादातर बीड़ी बनाने वाले श्रमिक इसकी चपेट में आ रहे हैं। उत्तर 24 परगना, पूर्व बद्र्धमान, मालदा, हुगली, पश्चिम मेदिनीपुर और हावड़ा घनी आबादी वाले बस्ती-बहुल जिले हैं। इस कारण वहां एक व्यक्ति के भी टीबी की चपेट में आने पर संक्रमण फैलने की प्रबल आशंका रहती है।

    वहीं, बीरभूम के पत्थर खदानों में काम करने वाले श्रमिक वायु प्रदूषण व धूल के कारण टीबी के शिकार हो रहे हैं। जहां तक कोलकाता की बात है तो यहां के सरकारी व निजी अस्पतालों में स्थानीय लोगों के अलावा विभिन्न जिलों से टीबी के मरीज इलाज कराने आते हैं इसलिए सबसे अधिक मामले अधिसूचित होते हैं।

    मुर्शिदाबाद में 20 प्रतिशत से ज्यादा पाजिटिव मामले

    फरक्का टीबी के मामले में मुर्शिदाबाद का सबसे प्रभावित इलाका है। मुर्शिदाबाद के फरक्का ब्लाक प्राइमरी हेल्थ सेंटर के अनुसार हर महीने टीबी के टेस्ट में 20 प्रतिशत से ज्यादा पाजिटिव मामले निकलते हैं। इनमें बीड़ी श्रमिकों की संख्या सबसे अधिक होती है।

    मालूम हो कि मुर्शिदाबाद में बीड़ी एक बड़ा उद्योग है। जिले की एक बड़ी आबादी के लिए यह जीविका का प्रमुख जरिया है। इनमें अधिकांश महिला श्रमिक हैं। फरक्का की तो 70 प्रतिशत आबादी बीड़ी बनाने के काम से जुड़ी हुई है। वहीं पूरे बंगाल की बात करें तो राज्य में करीब 20 लाख बीड़ी श्रमिक हैं। इनके टीबी की चपेट में आने की एक प्रमुख वजह बीड़ी बनाते वक्त मास्क नहीं पहनना है।

    बीरभूम में पत्थर खदानों में काम करने वाले हो रहे शिकार

    बीरभूम की बात करें तो वहां की एक बड़ी आबादी पत्थर खदानों में काम करती है। इस जिले के करीब 15.71 प्रतिशत लोग पत्थर तोडऩे व करीब 18 प्रतिशत उन्हें वहन करने का काम करते हैं। इस काम में 10 साल के बच्चे से लेकर 59 साल के बुजुर्ग तक शामिल हैं। इनमें ज्यादातर आदिवासी समुदाय के हैं। पत्थर खदानों में काम करने वाले 17.72 प्रतिशत लोगों में टीबी के मामले पाए गए हैं। रामपुरहाट ब्लॉक जिले का सबसे प्रभावित इलाका है।

    अलगाव नहीं, जागरुकता की जरुरत

    डॉ. बसु कहते हैं कि टीबी के इलाज के लिए अलगाव नहीं बल्कि जन जागरूकता की जरूरत है। लोगों को इस बीमारी के बारे में सटीक जानकारी होनी बहुत जरूरी है, तभी इससे बचा जा सकेगा। इसमें जन जागरूकता अभियानों की महत्वपूर्ण भूमिका है। हमने राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत पिछले साल सात दिसंबर से इस साल 24 मार्च तक 100 दिवसीय जागरूकता अभियान चलाया। घर-घर जाकर लोगों को इसके बारे में जानकारी दी। इसके लक्षणों, बचाव व इलाज के बारे में विस्तार से बताया।

    शुरुआती लक्षणों पर ध्यान देना बहुत जरूरी

    • डॉ बसु ने आगे कहा कि टीबी के शुरुआती लक्षणों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। सिर्फ खांसने पर खून आने अथवा सांस लेने में तकलीफ महसूस होना टीबी का लक्षण है, यह मान लेना संकटपूर्ण हो सकता है।
    • कमजोरी व थकावट महसूस होना, बुखार का लगातार जारी रहना, सीने में दर्द होना, भूख की कमी, वजन अचानक से घट जाना, शरीर के किसी हिस्से का सूज जाना भी टीबी के लक्षण हो सकते हैं। इन लक्षणों के लंबे समय तक बने रहने पर तत्काल चिकित्सकीय ध्यान देने की जरुरत है।
    • टीबी का एक्सरे व स्पटम टेस्ट से पता लगाया जा सकता है। इस रोग के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया 'माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्यूलोसिस' बाल व नाखून को छोड़कर शरीर के किसी भी अंग को संक्रमित कर सकता है। टीबी का शुरू में ही पता चल जाने व सही इलाज होने पर इसे जड़ से खत्म किया जा सकता है।
    • इसके उलट लक्षणों को नजरंदाज करने व ठीक से इलाज नहीं होने पर आगे चलकर स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। जान का भी खतरा हो सकता है। अधिकांश मामलों में टीबी का उस वक्त पता चलता है, जब यह काफी बढ़ चुका होता है। इलाज शुरू होने के बाद बीच में दवा लेना छोड़ देना भी घातक साबित हो सकता है।
    • अगर टीबी का लंबे समय तक इलाज नहीं कराया गया अथवा आधा-अधूरा इलाज करवाकर बंद कर दिया गया तो यह मल्टीड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) अथवा एक्सटेंशिवली ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एक्सडीआर-टीबी) में तब्दील हो सकता है, जिसके इलाज की अवधि काफी लंबी हो सकती है। इसका मानसिक स्वास्थ्य पर भी व्यापक रूप से असर पड़ता है। कुपोषित, एचआइवी पाजिटिव और तंबाकू का सेवन करने वाले लोगों को इससे सबसे ज्यादा खतरा है।
    • डॉ बसु ने बताया-'टीबी के बैक्टीरिया के संपर्क में आने वाले सभी को यह बीमारी नहीं होती। जिनकी रोग प्रतिरोधी शक्ति मजबूत है, उनके शरीर अपने अंदर इस बैक्टीरिया को सक्रिय होने से रोक सकते हैं।
    • टीबी का सबसे संक्रमित करने वाला प्रकार पल्मोनरी टीबी यानी फेफड़े का क्षय रोग है। इसके दूसरे लोगों में फैलने की आशंका सबसे अधिक होती है। टीबी के मरीजों का हवादार व स्वच्छ वातावरण में रहना बेहद जरूरी है। उन्हें पोषक खाद्य पदार्थों की भी काफी जरुरत है।'

    भावनात्मक व सामाजिक समर्थन भी बेहद जरुरी

    डॉ बसु कहते हैं-'सही इलाज के साथ-साथ टीबी के मरीजों के लिए भावनात्मक व सामाजिक समर्थन भी बेहद जरुरी है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि पीडि़त व्यक्ति को सामाजिक व आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े। अक्सर देखा जाता है कि जब परिवार में एकमात्र कमाने वाला टीबी से ग्रसित हो जाता है तो उसके व उसके परिवार की स्थिति बेहद संकटपूर्ण हो जाती है। अधिकांश ऐसे मामलों में पीडि़त व्यक्ति की नौकरी छूट जाती है।'