क्या आधार, वोटर, पैन और बैंक अकाउंट हैं नागरिकता के प्रमाण? कलकत्ता हाई कोर्ट ने किया क्लियर
कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वोटर, आधार, पैन कार्ड और बैंक खाते भारतीय नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं।
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कलकत्ता हाई कोर्ट

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राज्य ब्यूरो, कोलकाता। कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि न तो किसी व्यक्ति का वोटर कार्ड, न ही आधार कार्ड, और न ही बैंक खाता भारतीय नागरिकता का अचूक या निर्णायक प्रमाण माना जा सकता है।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठते हैं, तो इन दस्तावेजों के होने मात्र से उसे भारतीय नहीं माना जा सकता, जब तक कि कानूनी रूप से इसकी पुष्टि न हो जाए।
यह टिप्पणी न्यायालय ने मुर्शिदाबाद के एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसे विसंगतियों के चलते 'बांग्लादेशी' मानते हुए डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। अदालत ने राज्य की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से साफ इन्कार कर दिया।
उलझे हुए तथ्य और बयानों में विरोधाभास
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति देबांग्शु बासक और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बर रशीदी की खंडपीठ ने की। याचिका के अनुसार, नासिर और उसके चचेरे भाई सुमन मोल्ला को यह साबित करने के कई मौके दिए गए कि नासिर वंश भारतीय नागरिक है।
सुमन ने दावा किया था कि नासिर के पिता की मृत्यु 1980 में हो गई थी और उसने ही नासिर का पालन-पोषण किया है। हालांकि, अदालत ने इस दावे को खारिज कर दिया क्योंकि दस्तावेजों के मुताबिक 46 वर्षीय नासिर, 38 वर्षीय सुमन से उम्र में बड़ा था।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता और उसके गवाह के बयानों में भारी विरोधाभास था। पुलिस पूछताछ में सुमन ने खुद को नासिर का चचेरा भाई बताया था, जबकि अदालत में उसने खुद को चाचा करार दिया।
इसके अलावा, नासिर के माता-पिता के निधन के बाद उनके दफन स्थल की सटीक जानकारी न दे पाने के कारण डीएनए टेस्ट के जरिए स्थिति स्पष्ट करने का विकल्प भी जांचा नहीं जा सका।
कानून की नजर में ऑनस ऑफ प्रूफ और SIR प्रक्रिया
राज्य के वकील ने अदालत को बताया कि हिरासत के दौरान नासिर ने यह स्वीकार किया था कि वह एक बांग्लादेशी नागरिक है जो अवैध रूप से भारत में घुसा था।
हालांकि अदालत ने इस बात पर लंबी बहस में जाने से परहेज किया कि हिरासत में दिया गया बयान कितना मान्य है, लेकिन पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि चाहे पुलिस हिरासत के बयानों को छोड़ भी दिया जाए, फिर भी नागरिकता साबित करने की कानूनी जिम्मेदारी (आनस आफ प्रूफ) पूरी तरह से डिटेन किए गए व्यक्ति की ही होती है।
नासिर अपने पक्ष में कोई जन्म प्रमाण पत्र पेश नहीं कर सका। हालांकि सुमन ने उसकी ओर से वोटर कार्ड, आधार कार्ड, पैन कार्ड और यूनाइटेड बैंक आफ इंडिया की पासबुक जरूर अदालत में पेश की। इस पर खंडपीठ ने साफ किया कि वोटर आईडी केवल मतदाता सूची में नाम दर्ज होने का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं।
एसआईआर प्रक्रिया के दौरान नासिर का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था। अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि ठीक इसी तरह आधार, पैन और बैंक खाता भी अपने आप में भारतीय नागरिकता का पुख्ता प्रमाण नहीं हो सकते।
