कोलकाता, जयकृष्ण वाजपेयी। राजनीति में कब क्या हो जाए, कहना मुश्किल है। कब कौन दुश्मन और कौन दोस्त बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसकी बानगी आए दिन विभिन्न राज्यों में देखने को मिलती रहती है। इस समय बंगाल में भी कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी, जो एक सप्ताह पहले तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पानी पी-पीकर कोसते नहीं थक रही थीं, अब उनके सुर ऐसे बदल गए हैं कि विपक्ष से लेकर उनके दल के नेता भी हैरान-परेशान हैं। भ्रष्टाचार, घोटाले और तस्करी के खिलाफ सीबीआइ और ईडी जिस तरह से कार्रवाई कर रही है, उससे तृणमूल बड़ी मुसीबत में फंसी है।

पार्टी के कई नेता, सांसद, विधायक से लेकर मंत्री तक केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर हैं। इसके बावजूद ममता ने विधानसभा में पिछले दिनों खड़ा होकर कह दिया कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के पीछे पीएम मोदी का हाथ नहीं है। उनका कहना है कि भाजपा के नेताओं का एक तबका अपना हित साधने के लिए एजेंसियों का दुरुपयोग कर रहा है। समझना होगा कि सीबीआइ पीएमओ नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है। वर्ष 2014 से मोदी सरकार की विरोधी रहीं ममता के इस बयान से साफ हो गया है कि उन्होंने पीएम मोदी को क्लीन चिट देकर गृहमंत्री अमित शाह पर निशाना साधा है।

ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि अचानक से मोदी को लेकर ममता ने अपना सुर क्यों बदला है? क्या उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव कर पीएम की सीधी आलोचना से बचते हुए भाजपा और उनके अन्य नेताओं पर हमले की योजना बनाई है या फिर इसके पीछे कोई और बात है? क्या वाकई में मोदी को लेकर वह नरम हो गई हैं? यदि हां, तो ऐसा क्या हुआ कि मोदी पर हर समय हमला करने वालीं ममता की स्थिति में नाटकीय बदलाव आ गया और उनको मोदी की अच्छाई दिखने लगी है? उनके बयान के बाद से कांग्रेस से लेकर उनके विरोधी नेताओं का कहना है कि असल में जिस तरह से घोटाले व भ्रष्टाचार में तृणमूल के नेता, मंत्री से लेकर ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी सपत्नीक फंसे हुए हैं, उससे बचने के लिए वह सेटिंग कर रही हैं।

दरअसल, पिछले 19 सितंबर को बंगाल विधानसभा में केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव के पक्ष में 189 और विरोध में 69 मत पड़े। इस दौरान ममता करीब 27 मिनट तक सदन में बोलीं। उनके बयान ने हर किसी को हैरान कर दिया। ममता का प्रश्न था, 'क्या केंद्रीय एजेंसियों को देश में इस तरह से काम करना चाहिए? मुझे नहीं लगता कि इसके पीछे प्रधानमंत्री हैं, लेकिन कुछ भाजपा नेता हैं, जो सीबीआइ-ईडी का दुरुपयोग कर रहे हैं।' इससे महज कुछ दिन पहले तक उन्होंने आरोप लगाया था कि पीएम मोदी सीबीआइ और ईडी से राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई करा रहे हैं। इसके बाद उनका यह कहना कि इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य किसी की निंदा करना नहीं, बल्कि पक्षपात के बजाय तटस्थ रहना है। ममता ने कहा, ‘मैं यह नहीं कह रही कि सीबीआइ बुरी है। यहां बीएसएफ, सीआइएसएफ, एसएसबी, आइबी, रा और भी कई हैं। मैं केवल उनसे एकपक्षीय रहने के बजाय निष्पक्ष रहने का आवेदन कर रही हूं।’ कहीं ऐसा तो नहीं है कि ममता अब जान चुकी हैं कि मोदी पर सीधा प्रहार करने से लोग नाराज होते हैं, इसीलिए उनके बजाए भाजपा पर निशाना साधा जाए।

बताते चलें कि शिक्षक भर्ती घोटाले से लेकर कोयला व मवेशी तस्करी समेत विभिन्न मामलों में ईडी ने बंगाल में 21 बार छापामारी की है। पिछले कुछ समय में में ईडी और सीबीआइ ने 100 से अधिक मामले दर्ज किए हैं। सारधा, रोजवैली चिटफंड घोटाला, नारद स्टिंग, कोयला व मवेशी तस्करी, चुनाव बाद हिंसा, स्कूल सेवा आयोग भर्ती तथा शिक्षक पात्रता परीक्षा के जरिए नियुक्ति घोटाला, बीरभूम के बोगटूई नरसंहार और हासखाली दुष्कर्म व हत्याकांड की जांच सीबीआइ कर रही है। साथ ही बोगटूई, हासखाली की घटना को छोड़कर अन्य सभी मामलों की ईडी भी जांच कर रही है।

यही नहीं, बिहार से लेकर दिल्ली, महाराष्ट्र, झारखंड समेत कई और राज्यों में सीबीआइ-ईडी की कार्रवाई को लेकर जिस तरह से विपक्षी दल पीएम मोदी पर आक्रामक हैं, ऐसे समय में ममता का पीएम मोदी को क्लीन चिट देना कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को नहीं भा रहा। कांग्रेस ने तो भारतीय जनता पार्टी के साथ ममता बनर्जी की सेटिंग की भी बात कह दी है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा है। ऐसे में उसे केंद्र से लगातार वित्तीय मदद की जरूरत है, इसीलिए यह सीधे टकराव से बचाव का एक प्रयास भी हो सकता है। इतना ही नहीं, ममता ने इसी माह के आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी प्रशंसा की थी।

[राज्य ब्यूरो प्रमुख, बंगाल]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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