सिलीगुड़ी, दीपेंद्र सिंह। भयावह अग्निकांड ने एक पूरी बस्ती को राख का ढेर बना दिया है। सिर्फ बस्ती ही राख नहीं हुई है,यहां रहने वाले करीब 50 से अधिक परिवारों की तकदीर भी राख हो गई है। उनके पास कुछ भी नहीं बचा है।  सरकारी स्कूल व क्लब परिसर में मुश्किल से इनकी रातें कट रही हैं। ठंड के साथ सरसराती हवा जब बहती है तो बचने के लिए वे तन को ढंकने की हर संभव कोशिश करते दिख जाते हैं। एक ही कंबल से परिवार के कई सदस्य तन ढंकने की कोशिश करते हैं । गर्म कपड़े के नाम पर स्वयंसेवी संगठनों से मिले कुछ कपड़े ही इनके पास हैं। इनसे किसी तरह से काम चल रहा है।

आग की एक चिंगारी ने उनके बसे बसाए जीवन की दशा व दिशा ही बदल दी है। पूरी घटना को भूल जाने की लाख कोशिशों के बीच आखिरकार उनका मन नहीं मान रहा है। तभी तो जलकर स्वाहा हो चुके आशियाने की राख की ढेर में उम्मीद के साथ उनकी निगाहें कुछ ढूूंढती नजर आ रही हैं। रुपए-पैसे, गहने, कागजात सब कुछ तो जल गए हैं।

वार्ड नंबर 18 के बागराकोट के खुदीराम कालोनी का दृश्य बेहद मर्माहत करने वाला है। करीब 50 से अधिक घर जल चुके हैं। बस उनके कुछ अवशेष ही दिखाई दे रहे हैं। एक बड़े भू-भाग में सिर्फ राख व लकड़ी जलने के बाद बने कोयले की ढेर दिखाई दे रही है। नगर निगम के वैन कचरा हटाने के कार्य में लगातार जुटे हुए हैं। यहां अभी भी अफरा-तफरी का एक माहौल है, जहां लोग फिर से अपने जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश भी करते दिख रहे हैं। हालांकि उनके लिए फिर से उठ कर खड़ा होना आसान नहीं है। शून्य से आगे बढ़ना आसान होता भी नहीं है।

अगलगी में खंडहर में तब्दील हो चुके घरों में सिर्फ कंक्रीट के खंबे बचे हुए हैं। इन खंबों पर फिर से टीन का चदरा लगाने की जद्दोजहद सबको करनी है। फिर से उसे ईट या टीन से चारों ओर से घेरना होगा। नगर निगम से उन्हें आश्वासन मिला है, लेकिन इसे वास्तविक रूप में आने में कई चरण बाकी हैं। स्कूल राहत कैंप में तब्दील बच्चों की पढ़ाई-लिखाई ठप हो चुकी है। झोला और बैग समेत किताबें जल चुकी हैं। यहां के स्कूल राहत कैंप में तब्दील हो चुके हैं। प्रभावितों का कहना है कि उनके जीवन में दुख के सिवाय कुछ नहीं है। बड़ी मुश्किल से गुजर-बसर करते आ रहे थे, लेकिन अब वो भी नहीं रहा। उन्हें मदद का भरोसा मिला है,लेकिन जब तक घर तैयार ना हो जाए व जीवन फिर से स्थापित नहीं हो जाए, तब तक यकीन करना जरा मुश्किल है।

रेलवे की जमीन पर बसी है बस्ती

खुदीराम कालोनी बस्ती के लोगों की मुश्किलों का अंत यही नहीं है। वे जिस जमीन पर रहते हैं वह रेलवे की है। वहां चाहकर भी नगर निगम स्थाई पक्का का निर्माण नहीं करा सकता है। इसके लिए रेलवे से यहां की जमीन को अपने कब्जे में लेना होगा। इसके बाद ही वहां स्थाई निर्माण संभव है। नगर निगम की ओर से पहले भी कई बार कहा जा चुका है कि रेलवे उन जमीनों को उसे हस्तांतरित कर दे, जिस पर बस्तियां बस चुकी हैं। ऐसा होने से नगर निगम इस पर विकास का कार्य कर पाएगा। कई प्रकार की तकनीकी समस्या निगम रेलवे की जमीन पर बसी बस्तियों में विकास कार्य करना चाहे भी तो एक सीमा से ज्यादा नहीं कर सकता है। वहीं रेलवे अब तक इस बात के लिए कतई राजी नहीं है। सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन, जंक्शन, एनजेपी इलाके में रेलवे की जमीन पर कई बस्तियां बसी हुई हैं। वहां पक्के निर्माण तक हो चुके हैं। निगम की ओर से बिजली व पानी की आपूर्ति भी की जा रही है। उन्हें वोटर कार्ड व राशन कार्ड भी हासिल है।

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