जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी : लोक आस्था का महापर्व छठ धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ आमजनों को पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ प्रकृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। प्रकाश, ताप एवं सृष्टि के जनक सूर्य की उपासना एवं पूजा-अर्चना का यह त्योहार वैज्ञानिकता से भी जुड़ा है। सूर्य उपासना एवं पूजा अर्चना की परंपरा वैसे तो वषरें से चली आ रही है। लेकिन वर्तमान समय में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रही दुनिया को निजात दिलाने के लिए सूर्य को प्रसन्न करने के लिए छठ महापर्व के अनुष्ठान का खास महत्व है। यह ऐसा पूजा विधान है, जिसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकृति प्राप्त संसाधनों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। खासकर वर्तमान समय में पर्यावरण पर मंडराते खतरे एवं कृत्रिमता के बढ़ते प्रभाव से उत्पन्न विकृतियों को देखते हुए इस त्योहार का महत्व और अत्यधिक बढ़ गया है।

प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा

छठ महापर्व के अनुष्ठान के दौरान हरे कच्चे बास की डाला, मिट्टी के चूल्हा, प्रकृति प्रदत्त फल, ईख सहित अन्य चीजों के उपयोग का विधान है। इस त्योहार में प्रकृति से प्राप्त होने वाले चीजों का महत्व लोगों को समझने को मिलता है जो आमजनों को प्रकृति से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है।

स्वच्छता की भावना होती है है प्रबल

इस त्योहार अनुष्ठान में पवित्रता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। जिससे आम जीवन में साफ-सफाई एवं स्वच्छता की भावना जागृत होती है। पूजा में कच्ची हल्दी, पान, दूध, सुपारी, सिघारा, नारियल, डाभ आदि से भगवान सूर्य को अर्घ अर्पित किया जाता है। उक्त सभी चीजें स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। अनुष्ठान के माध्यम से लोगों को दैनिक जीवन में ऐसे स्वास्थ्यव?र्द्धक चीजों के उपयोग करने की प्रेरणा मिलती है।

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