उत्‍तरकाशी, शैलेंद्र गोदियाल। मुश्किलों के पहाड़ भी मंजिल की सीढ़ियां बन गए, जब जिंदगी जीने को मैंने मन की सुनी, यह पंक्तियां कुछ इसी तरह का स्वच्छंद जीवन जीने वाली चमोली जिले की इंजीनियर बेटी देवेश्वरी बिष्ट पर सटीक बैठती हैं। इंजीनियर की नौकरी छोड़ और रूढ़ियों को तोड़ वह अपनी इच्छा एवं अपने अरमानों को खुलकर जी रही हैं। हिमालय की घाटी से लेकर शिखर तक की सैर करने और सैर कराने वाली देवेश्वरी हिमालय की देवी से कम नहीं है। बीते साढ़े चार सालों से वह पहाड़ में स्वरोजगार के लिए हिमालय ट्रैकिंग व हेरिटेज ट्रैकिंग को प्रमोट कर रही हैं। साथ ही पहाड़ी संस्कृति को संजोने में भी जुटी हैं।

यह कहानी है 27-वर्षीय देवेश्वरी बिष्ट की, जो जीवन एवं जीवन जीने के तरीकों को लेकर युवा पीढ़ी की सोच को बखूबी देश-दुनिया के सामने रख रही हैं। देवेश्वरी ने अपने बचपन के शौक ट्रैकिंग को कॅरियर की शक्ल देकर एक बड़ा मकसद इसमें जोड़ दिया है। देवेश्वरी उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ तक उच्च हिमालय में ट्रैकिंग कर चुकी हैं और कई दलों को भी ट्रैकिंग करा चुकी हैं। उत्तरकाशी जिले की नेलांग घाटी में देवेश्वरी ने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) के साथ मिलकर बीती जुलाई में माउंट मुम्बा का सफल आरोहण किया। इससे पहले वह द्रोपदी का डांडा सहित कई अन्य चोटियों का भी आरोहण कर चुकी हैं। अब इसी सप्ताह वह त्रिशूल चोटी के आरोहण पर निकल रही हैं।

सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली देवेश्वरी एक भाई और दो बहनों में सबसे छोटी हैं। उनकी 12वीं तक की पढ़ाई गोपेश्वर में हुई। इंजीनियरिंग में डिप्लोमा लेने के बाद वर्ष 2009 में उन्होंने जल संस्थान गोपेश्वर में बतौर अवर अभियंता कार्य करना शुरू किया। तीन साल बाद इसी पद पर उन्हें उरेडा में भेज दिया गया, लेकिन अपने बचपन के शौक और संस्कृति एवं पहाड़ के प्रति गहरे लगाव के चलते वर्ष 2015 में उन्होंने नौकरी को अलविदा कह ट्रैकिंग के जरिये स्वरोजगार की अलख जगानी शुरू की।

पूरे कर रहीं अरमान

देवेश्वरी बताती हैं कि बचपन से ही उन्हें पहाड़ की वादियां बेहद भाती रही हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने चमोली, टिहरी, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, बागेश्वर व पिथौरागढ़ जिलों के सभी प्रमुख पर्यटक स्थलों की सैर कर ली थी। वर्ष 2015 में उन्होंने ट्रैकिंग अभियान की शुरुआत की। इसके तहत अब तक वह 1500 से अधिक देशी-विदेशी पर्यटकों को ट्रैकिंग करा चुकी हैं।

खुद तय किए ट्रैकिंग रूट

देवेश्वरी कहती हैं कि पहाड़ के हर गांव में ट्रैकिंग रूट हैं, जो सिर्फ गांव ही नहीं, पहाड़ की संस्कृति एवं सभ्यता को भी जोड़ते हैं। इसी कारण उन्होंने पहाड़ के कौथिग-मेलों व पौराणिक स्थलों को भी अपने ट्रैकिंग चार्ट में शामिल किया है। इसके अलावा उन्होंने निम से बेसिक व एडवांस कोर्स भी किया है। इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन (आइएमएफ) की ओर से उन्होंने एडवेंचर ट्रैवल एस्कॉर्ट का कोर्स भी किया है। 

फोटोग्राफी का शौक भी कर रहीं पूरा 

देवेश्वरी महज ट्रैकिंग ही नहीं करतीं, बल्कि हिमालय की मनमोहक छवियों को भी कैमरे में कैदकर उनसे देश-दुनिया को रू-ब-रू कराती हैं। देवेश्वरी के पास पहाड़ों की बेहतरीन तस्वीरों का एक शानदार कलेक्शन है। इसमें पहाड़, फूल, बुग्याल, नदी व झरनों से लेकर लोकसंस्कृति और लोक विरासत को चरितार्थ करती दस हजार से भी अधिक तस्वीर शामिल हैं। उत्तराखंड पर्यटन विभाग की ओर से आयोजित प्रतियोगिता में केदारनाथ की फोटोग्राफी के लिए देवेश्वरी को दूसरा स्थान मिला। 

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ट्रैकिंग से स्वरोजगार बढ़ाने को कर रहीं काम

देवेश्वरी ने 'ग्रेट हिमालयन जर्नी' नाम अपनी कंपनी पंजीकृत की है। साथ ही इसी नाम से अपनी वेबसाइट और फेसबुक पेज बनाया है। ताकि लोगों को आसानी से उत्तराखंड के ट्रैकों के बारे में जानकारी मिल सके। ट्रैकिंग से स्वरोजगार बढ़ाने के लिए उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर 15 से अधिक युवाओं को जोड़ा है। जो गाइड व पोर्टर का काम करते हैं। पंचकेदार, पंच बदरी, फूलों की घाटी, हेमकुंड, स्वर्गारोहणी, कुंवारी पास, केदारताल, दयारा बुग्याल, पंवालीकांठा, पिंडारी ग्लेशियर, कागभुसुंडी, देवरियाताल, घुत्तु से खतलिंग ग्लेशियर आदि ट्रैकों पर वह ट्रैकिंग करा रही हैं।

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