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Kichha-Sirauli Kalan Municipal Elections: बेहड़ का दबदबा, शुक्ला का दांव धराशायी

Published: Thu, 08 Oct 2026 11:58 AM (IST)

किच्छा और सिरौलीकलां नगर पालिकाओं में कांग्रेस की जीत से विधायक तिलकराज बेहड़ का राजनीतिक कद बढ़ा है। यह जीत ...और पढ़ें

पूर्व विधायक राजेश शुक्ला, किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़.

पूर्व विधायक राजेश शुक्ला, किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़.

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अनुज सक्सेना, किच्छा । चुनाव पालिका अध्यक्ष का था और चेहरे थे राजेश प्रताप सिंह और संदीप अरोड़ा... लेकिन दांव पर असली सियासी प्रतिष्ठा दो दिग्गज किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला की लगी थी। हर जुबान पर यही सवाल था कि किच्छा में किसका दम ज्यादा है ?

यह छोटा चुनाव बड़ा संदेश देकर जाएगा। बुधवार को मतगणना के बाद तस्वीर साफ हुई तो जवाब भी मिल गया। किच्छा के साथ सिरौलीकलां नगर पालिका क्षेत्र के मतदाताओं ने दोनों जगह कांग्रेस की जीत दर्ज कराकर जहां तिलकराज बेहड़ के सियासी वर्चस्व पर मुहर लगा दी, वहीं शुक्ला का दांव धराशाई कर दिया।

किच्छा नगर पालिका चुनाव में अध्यक्ष पद पर कांग्रेस ने राजेश प्रताप सिंह को उतारा था तो भाजपा से संदीप अरोड़ा थे। राजेश प्रताप सिंह की चुनावी कमान तिलकराज बेहड़ के हाथ रही तो शुक्ला ने अरोड़ा के लिए दिन रात एक किया। यानी चुनावी प्रबंधन पूरी तरह इन्हीं दोनों दिग्गजों के हाथ था।

इन दोनों की सक्रियता से यह चुनाव आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सेमीफाइनल के रूप में देखा जाने लगा। सभाओं से लेकर इंटरनेट मीडिया तक में बेहड़ और शुक्ला ही आरोप - प्रत्यारोग के एक दूसरे पर सियासी तीर चला रहे थें। उस आधार पर देखें।तो मतदाताओं ने अपना निर्णय दोनों धुरंधरों को ध्यान में रखकर ही अपना निर्णय सुनाया है।

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मुस्लिम मतों की कांग्रेस के पक्ष में एकजुटता ने भी दे दी ताकत

किच्छा नगर पालिका क्षेत्र में करीब 17 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। यहां पर जब बेहड़ ने राजेश प्रताप सिंह को चुनावी समर में उतारा था तो एक अब्दुल रशीद उर्फ जक्कू भाई ने भी नामांकन करा दिया। जक्कू भाई पहले भी निकाय चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए लड़ चुके थे और बहुत कम अंतर से हार गए थें।

ऐसे में गणित लगाया जा रहा था कि हिंदू वोट भाजपा के साथ आ जाएगा और मुस्लिम मत बंट जाएंगे, अन्ततः जीत का सेहरा भाजपा प्रत्याशी के सिर पर बंध जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मुस्लिम मतों में भी तिलकराज बेहड़ का ही जादू चला और निर्दलीय लड़ने वाले जक्कू भाई भी मात्र आठ सौ से कुछ अधिक वोट ही हासिल कर सके।

भाजपा की अंदरूनी बगावत ने भी खिलाया गुल

जिस वक्त निकाय अध्य्क्ष पद पर भाजपा प्रत्याशी के रूप में संदीप अरोड़ा के नाम की घोषणा हुई, उसी समय भाजपा में एकाएक असंतोष उभर कर सामने आ गया। स्थिति यह हो गई कि शैली फुटेला, लवी सहगल और एक अन्य ने नामांकन पत्र भर दिया। उसके बाद इनको मनाने की कसरत तेज हुई।

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स्थानीय स्तर पर भाजपा पदाधिकारियों के तमाम जोर लगाने के बाद भी नहीं मानें तो मामला प्रदेशाध्यक्ष महेंद्र भट्ट और फिर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक पहुंच गया। मुख्यमंत्री धामी से बात करने के बाद लगभग सभी बागी मान गए और नामांकन वापस ले लिया।

बताया जाता है कि इन लोगों ने स्थानीय स्तर पर की जा रही अनदेखी और अन्य तरह की उपेक्षा को सीएम धामी के सामने रखा। मुख्यमंत्री ने सबको सुना और आश्वस्त किया कि सबका सम्मान होगा। इन सभी नेताओं ने मुख्यमंत्री धामी की तारीफ भी जानकर की थी। लेकिन चर्चा है कि स्थानीय नेताओं को लेकर नाराजगी फिर भी दूर नहीं हो सकी। अंततः यह बगावत भी कहीं न कहीं नुकसान पहुंचाने में कामयाब रही।

हिंदू - मुस्लिम का कार्ड भी नहीं आया काम

निकाय चुनाव में हर प्रकार के सियासी हथकंडे देखने को मिले। इन्हीं में से एक था हिंदू मुस्लिम का कार्ड। इसके पीछे का गणित था कि हिंदू वोट एकजुट होकर भाजपा के पक्ष में आ जाएगा और मुस्लिम मत कांग्रेस के पक्ष में चले जाएंगे। इससे भाजपा को जीतने में सफलता मिल जाएगी।

यह रणनीति भी उल्टी पड़ गई। इसका भी लाभ कांग्रेस को ही मिल गया। हिंदू मतदाताओं ने इस कार्ड के बाद भी किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़ में ही विश्वास जताया जबकि मुस्लिम मत इससे एकजुट होकर तिलकराज बेहड़ के साथ खड़े हो गए।