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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 20, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

काशीपुर में थी कभी विदेशी कपड़ों की मंडी

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Published: Fri, 20 May 2016 07:06 PM (IST)Updated: Sat, 21 May 2016 11:18 AM (IST)

जागरण संवाददाता, काशीपुर : आजादी से पहले काशीपुर में विदेशी कपड़ों की मंडी थी। जापान, चीन व इंग्लैंड

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जागरण संवाददाता, काशीपुर : आजादी से पहले काशीपुर में विदेशी कपड़ों की मंडी थी। जापान, चीन व इंग्लैंड से कपड़े यहां आते थे। यहां से इनका व्यापार तिब्बत से होता था। खच्चरों से माल भेजा जाता था। वहां से वापसी में सुहागा व घी लाया जाता था।

प्राचीन शहर काशीपुर के बारे में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने गोविषाण टीला व द्रोणा सागर का जिक्र किया है। उनकी किताब में उल्लेख है कि यह शिक्षा, धर्म व संस्कृति का शहर है। तराई का यह शहर पहले से ही काफी विकसित रहा है। आजादी से पहले यहां जापान से मखमल, चीन से रेशमी व इंग्लैंड के मैनचेस्टर से सूती कपड़े आते थे, जिनका तिब्बत व पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापार होता था। इस पेशे से जुड़े करीब दो सौ लोग फेरी लगाते थे। ट्रांसपोर्ट सुविधा न होने से खच्चरों से माल भेजा जाता था, जो गंतव्य तक कई दिनों बाद पहुंचता था। व्यापारी जब लौटते थे तो साथ में पर्वतीय घी व सुहागा लेकर आते थे। सुहागा एक प्रकार का रसायन होता है, जिसका प्रयोग दवाओं के साथ सोना गलाने में किया जाता है। तब काशीपुर को मैनचेस्टर ऑफ हिल्स का नाम मिला था। यहां के कुछ लोग जब मखमली व रेशमी कपड़े पहनकर निकलते थे तो लोग देखते रह जाते थे।

आजादी से पहले ही ट्रांसपोर्ट की सुविधा शुरू हुई तो दिल्ली व अन्य शहरों से सीधे माल जाने लगा। वर्ष 1937-38 आते-आते यहां की मंडी खत्म हो गई। यहां वर्तमान में जो पुरानी सब्जी मंडी है, वहां पहले कपड़ों की मंडी होती थी। करीब 50 कपड़ों के व्यापारी थे। आजादी के बाद भी उत्तर प्रदेश हथकरघा निगम ने सूती वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने का प्रयास किया, मगर इसने भी दम तोड़ दिया।

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फोटो:20केएसपी-12

पं. शिव कुमार शर्मा

91 वसंत देख चुके पं. शिव कुमार शर्मा बताते हैं कि उनके पिता कपड़ों का ही व्यापार करते थे। मैनचेस्टर बंदरगाह से दुनिया में कपड़ों की सप्लाई होती थी। जापान से मखमल व चीन से रेशमी कपड़ों का यहां पर व्यापार होता था। यहां से कपड़े तिब्बत व पर्वतीय क्षेत्रों में भेजे जाते थे। वापसी में व्यापारी घी व सुहागा लाते थे। ट्रांसपोर्ट की सुविधा होने से कपड़ों की मंडी खत्म हो गई।