कोटद्वार, अजय खंतवाल। सुनने में अजीब जरूर लगता है, लेकिन सच यही है कि पौड़ी जिले के प्रमुख शहर कोटद्वार से लगे जंगलों में दो सौ साल पहले गैंडे भी विचरण किया करते थे। हालांकि, कॉर्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व के मध्य अवस्थित लैंसडौन वन प्रभाग के दस्तावेजों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के दौर के दस्तावेज तस्दीक करते हैं कि गंगा के किनारे पाए जाने वाले गैंडे अक्सर कोटद्वार क्षेत्र के जंगलों तक पहुंच जाया करते थे। प्रभाग के जंगलों में रही गैंडों की मौजूदगी का पता चलने के बाद अब वन प्रभाग भी उन साक्ष्यों को तलाशने में जुट गया है। ताकि इस बात की आधिकारिक रूप से पुष्टि की जा सके।

वर्तमान में लैंसडौन वन प्रभाग की पहचान हाथियों की पनाहगाह के रूप में होती है। लेकिन, एक दौर में प्रभाग के जंगलों में गैंडों की भी मौजूदगी रही। वर्ष 1789 में जब खोह नदी के तट पर पहली बार गैंडे को देखा गया, तब लैंसडौन वन प्रभाग का कोई अस्तित्व नहीं था। वर्ष 1897 में जब लैंसडौन वन प्रभाग की स्थापना हुई, संभवत: तब इन जंगलों से गैंडे लुप्त हो चुके थे। 

यही वजह है कि प्रभाग के किसी भी वर्किंग प्लान में गैंडों का जिक्र नहीं है। क्षेत्र में प्रथम बार गैंडा वर्ष 1789 में देखा गया। तब उस दौर के प्रसिद्ध चित्रकार थॉमस डेनियल अपने भतीजे विलियम डेनियल के साथ कोलकाता से हरिद्वार घूमने आए थे। हरिद्वार से वे कोटद्वार की ओर आए और यहां से पहाड़ी रास्तों से श्रीनगर-गढ़वाल की ओर रवाना हुए।

थॉमस और विलियम पहले यूरोपियन थे, जिन्होंने कोटद्वार से श्रीनगर का सफर पहाड़ी दर्रों से होकर किया। 20 अप्रैल 1789 को कोटद्वार पहुंचे थॉमस डेनियल और उनके भतीजे विलियम डेनियल ने यहां गैंडा देखा था। 

इसका जिक्र विलियम डेनियल ने अपनी पुस्तक 'द ओरिएंटल एनुअल, और सीन्स इन इंडिया' में किया है। पुस्तक में विलियम ने उस गैंडे के स्कैच को भी प्रकाशित किया है, जो उन्होंने कोटद्वार क्षेत्र में देखा था। वह लिखते हैं, 'पहाड़ी के निचले क्षेत्रों में हाथी का पाया जाना सामान्य था, लेकिन जैसे ही हम पहाड़ी से निकल रही जलधारा की ओर बढ़े तो सामने ही एक अच्छा-खासा नर गैंडा नजर आया। वह पानी के पास खड़ा था। उसका सिर थोड़ा मुड़ा हुआ था और ऐसा लग रहा था कि वह ठंडी जलधारा में प्यास बुझाने आया है। विलियम ने अपने चाचा थॉमस डेनियल के संरक्षण में मौके पर ही गैंडे का स्कैच भी तैयार कर दिया। 

जुटाए जा रहे गैंडों के बारे में साक्ष्य

कोटद्वार क्षेत्र के जंगलों में रही गैंडों की मौजूदगी से संबंधित विश्व प्रकृति निधि (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) से मिले दस्तावेजों के आधार पर अब लैंसडौन वन प्रभाग यहां गैंडों की मौजूदगी के साक्ष्य जुटाने की तैयारी में है। साथ ही उस दौर में क्षेत्र के वातावरण की जानकारी एकत्र करने का भी प्रयास किया जा रहा है। 

लैंसडौन वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी वैभव प्रताप सिंह ने बताया कि कोटद्वार क्षेत्र के जंगलों में रही गैंडे की मौजूदगी वास्तव में हैरतअंगेज है। उस दौर में क्षेत्र की जलवायु किस तरह की रही होगी, इसका अध्ययन कर वर्तमान से तुलना की जाएगी। यदि जलवायु परिवर्तन में अधिक अंतर नहीं मिला तो यह क्षेत्र के लिए निश्चित रूप से सुखद होगा।

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Posted By: Raksha Panthari

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