अल्मोड़ा, जेएनएन : वन की नई परिभाषा देने व 10 हेक्टेयर व 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले जंगलात को वन न मानने संबंधी फरमान पर उच्च न्यायालय की रोक के बाद अब भारतीय वन अधिनियम 2019 में प्रस्तावित संशोधनों पर भी नई बहस छिडऩे लगी है। सदस्य राज्य वन अनुसंधान सलाहकार परिषद डॉ. जीवन सिंह मेहता ने इस प्रस्तावित संशोधन में वन पंचायतों का जिक्र तक न किए जाने पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने विभाग प्रमुख जयराज को मेल भेजकर कारण पूछे हैं। साथ ही वन पंचायतों को और अधिक सुदृढ़ बनाए जाने के लिए प्रबल संस्तुति के लिए दबाव बनाया है।

ऐसे समझें पूरा प्रकरण

दरअसल, आइएफए 2019 के सेक्शन-28 में प्रस्तावित संशोधन के लिए उत्तराखंड की वन पंचायतों को और सुदृढ़ किए जाने की संस्तुतियां दूर इसमें जिक्र तक नहीं किया गया है। इससे विशेषज्ञ एवं पूर्व वनाधिकारी सकते में हैं। सदस्य राज्य वन अनुसंधान सलाहकार परिषद एवं पूर्व डीएफओ डॉ. मेहता ने पूछा है कि प्रस्तावित संशोधनों में कानूनी रूप से उत्तराखंड में गठित वन पंचायतों का जिक्र क्यों नहीं किया गया है। उन्होंने जंगलात संरक्षण में अहम भूमिका निभाने वाली ऐतिहासिक संस्था की कानूनी सुरक्षा के लिए विशेष उल्लेख कर भारत सरकार को प्रबल संस्तुति की पुरजोर वकालत की है। इसके लिए उन्होंने विभाग प्रमुख जयराज को मेल भी भेजा है।

तो सीसीएफ वन पंचायत व दो संरक्षक क्यों बैठाए

डॉ. मेहता के मुताबिक वन पंचायतों के सुदृढ़ीकरण को कई वर्षों से उत्तराखंड में प्रमुख वन संरक्षक (वन पंचायत) का पद तक सृजित किया गया है। वन पंचायतों की बेहतरी को बाकायदा दो भारी भरकम पद वन संरक्षक के भी हैं। मगर इतना सब होने के बावजूद प्रस्तावित संशोधनों में वन पंचायतों का जिक्र तक न किया जाना गंभीर है।

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Posted By: Skand Shukla

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