हल्द्वानी, गणेश पांडे : उत्तराखंड के चम्पावत जिले के देवीधुरा में होने वाले पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व के बग्वाल मेले में प्रयोग होने वाली ढाल राष्ट्रीय धरोहर का हिस्सा बन गई है। देवीधुरा के प्रसिद्ध मां बाराही मंदिर में रक्षाबंधन के दिन होने वाले बग्वाल मेले में चार गांवों (स्थानीय भाषा में चार खाम) के लोग दो समूह में बंटकर एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं।
पत्थरों की बारिश से चोटिल होने से बचाने वाली ढाल (फर्रे) को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल में प्रदर्शित किया गया है। बाराही मंदिर में श्रावण शुक्ल एकादशी से कृष्ण जन्माष्टमी तक मेला आयोजित होता है। रक्षाबंधन यानी श्रावण पूर्णिमा के दिन होने वाली 'बग्वाल' एक तरह का पाषाण युद्ध है, जिसे देखने देश के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं। आचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी मेले को लेकर चली आ रही मान्यता बताते हुए कहते हैं कि बग्वाल खेलने वाला व्यक्ति यदि पूर्णरूप से शुद्ध व पवित्रता रखता है तो उसे पत्थरों की चोट नहीं लगती।

बांस व रिंगाल से तैयार होती है ढाल
गाल व छतरी आकार के फर्रे को पतली-पतली बांस व रिंगाल की डंडियों से तैयार किया जाता है। डंडियों को आपस में इतनी कसकर जोड़ा जाता है, ताकि वह तेज गति से आ रहे पत्थरों का वेग आसानी से सह सके। अंदर की तरफ फर्रे को पकडऩे के लिए हैंडल बनाया जाता है, ताकि तेजी से आते पत्थरों को रोकते समय पकड़ मजबूत बनी रहे।

डॉ. नयाल ने किया संकलन 
मानव विज्ञान संग्रहालय भोपाल के अंतरंग भवन वीथि संकुल में प्रदर्शित ढाल का संकलन संग्रहालय के सहायक डॉ. आरएम नयाल ने किया है। डॉ. नयाल ने बग्वाल मेले व ढाल की बेसिक जानकारी देते हुए दस्तावेज भी तैयार किए हैं।

इस पहल से देश-विदेशी में होगा संस्‍कृति का प्रसार
खीम सिंह लमगडिय़ा, अध्यक्ष मां बाराही मंदिर समिति देवीधुरा ने बताया कि बग्वाल मेला प्राचीन समय से चला आ रहा है। स्थानीय लोग आज भी उसी आस्था से इसकी परंपरा निभाते हैं। बग्वाल में प्रयोग होने वाली ढाल को मानव विज्ञान संग्रहालय में प्रदर्शित करना लोक परंपरा को संरक्षित करने जैसा है। देश-विदेश के लोग मेले के बारे में जान पाएंगे। 

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Posted By: Skand Shukla

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