Sawan 2022: उत्तराखंड में एकमात्र दक्षिणमुखी शिव मंदिर बाबा बागनाथ
Sawan 2022 बागनाथ मंदिर को चंद्र वंशी राजा लक्ष्मी चंद ने 1602 में बनाया था। मंदिर के नजदीक बाणेश्वर मंदिर है। ये मंदिर भी वास्तु कला की दृष्टि से बागनाथ मंदिर के समकालीन लगता है। इसके पास में ही भैरवनाथ का मंदिर बना है।

जागरण संवाददाता, बागेश्वर: भगवान शिव के देश व दुनिया में हजारों मंदिर हैं। हर मंदिर की अपनी एक विशेष कथा है। वहीं देश में भगवान शिव का एक मंदिर ऐसा भी है, जहां भगवान शिव बाघ रूप में विराजमान हैं। यह उत्तरखंड में एकमात्र प्राचीन शिव मंदिर है जो कि दक्षिण मुखी है। जिसमें शिव शक्ति की जल लहरी पूर्व दिशा को है। यहां शिव पार्वती एक साथ स्वयंभू रूप में जल लहरी के मध्य विद्यमान हैं।
गोमती, सरयू नदी के संगम पर स्थित बागनाथ मंदिर धर्म के साथ पुरातात्विक दृष्टिकोण से भी काफी महत्वपूर्ण है। मार्केंडेय ऋषि की तपोभूमि है। पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि भगवान शंकर यहां बाघ रूप में निवास करते हैं। पहले इस जगह को व्याघ्रेश्वर नाम से जाना गया। बाद में ये बागेश्वर हो गया।
बागनाथ मंदिर को चंद्र वंशी राजा लक्ष्मी चंद ने 1602 में बनाया था। मंदिर के नजदीक बाणेश्वर मंदिर है। ये मंदिर भी वास्तु कला की दृष्टि से बागनाथ मंदिर के समकालीन लगता है। इसके पास में ही भैरवनाथ का मंदिर बना है। बताया जाता है कि बाबा कालभैरव इस मंदिर में द्वारपाल रूप में निवास करते हैं और यहीं से पूरी दुनिया पर नजर रखते हैं।
शिव बाघ और पार्वती ने रखा गाय का रूप
पुराणों में लिखा गया है कि अनादिकाल में मुनि वशिष्ठ अपने कठोर तपबल से ब्रह्मा के कमंडल से निकली मां सरयू को ला रहे थे। ब्रह्मकपाली के पास मार्कण्डेय ऋषि तपस्या में लीन थे। वशिष्ट जी को उनकी तपस्या को भंग होने का खतरा सताने लगा। धीरे-धीरे वहां जल भराव होने लगा। सरयू नदी आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने शिवजी की आराधना की। महादेव बाघ और पार्वती गाय के रूप में विराजमान हुई थीं।
बेलपत्र से पूजा
बागनाथ मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्र से ही पूजा होती है। कुमकुम, चंदन और बताशे चढ़ाने की भी परंपरा है। महादेव को खीर और खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। बागनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी रावल जाति के लोग हैं।
ऐसे पहुंच बागनाथ मंदिर
बागनाथ मंदिर दिल्ली से 502 किलोमीटर दूर है। इसके साथ ही देहरादून से 470 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है।दिल्ली से बस और ट्रेन से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। आनंद विहार बस स्टेशन से बस और पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन में हल्द्वानी पहुंचा जा सकता है। जहां से बस या टैक्सी से अल्मोड़ा होते बागेश्वर पहुंचा जा सकता है।
मंदिर कमेटी के अध्यक्ष नंदन सिंह रावल ने बताया कि शिव पुराण के मानस खंड के अनुसार इस नगर को शिव के गण चंडीश ने बसाया था। महादेव की इच्छा के बाद ही इस नगर को बसाया गया था। पहले मंदिर बहुत छोटा था। बाद में चंद्रवंशीय राजा लक्ष्मी चंद्र ने 1602 में मंदिर को भव्य रूप दिया।
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