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    44 साल बाद दोबारा उत्तराखंड पहुंची पहाड़ी बया, असम के काजीरंगा में भी है बसेरा

    By Skand ShuklaEdited By:
    Updated: Mon, 29 Jun 2020 11:38 AM (IST)

    जंगल के साथ-साथ पक्षी प्रेमियों के लिए अच्छी खबर है। पहाड़ी बया 44 साल बाद फिर से उत्तराखंड में तराई के जंगल में लौट चुकी है। मगर इस बार बया ने अपना डेरा बदला है।

    44 साल बाद दोबारा उत्तराखंड पहुंची पहाड़ी बया, असम के काजीरंगा में भी है बसेरा

    हल्द्वानी, जेएनएन : जंगल के साथ-साथ पक्षी प्रेमियों के लिए अच्छी खबर है। पहाड़ी बया 44 साल बाद फिर से उत्तराखंड में तराई के जंगल में लौट चुकी है। मगर इस बार बया ने अपना डेरा बदला है। 1976 में यह कालाढूंगी के जंगलों में नजर आई थी। और अब तराई केंद्रीय वन प्रभाग के रुद्रपुर से सटे जंगल में घोंसले बना चुकी है। फॉरेस्ट के मुताबिक पहाड़ी बया को काफी दुर्लभ प्रजाति है। विश्व में इस चिडिय़ा की संख्या एक हजार करीब है। अंग्रेजी में इसे फिन्न वीवर कहा जाता है। यह नाम कांग्रेस के संस्थापक रहे एओ हृयूम ने दिया था। उनके द्वारा ही इस चिडिय़ा को खोजा गया।

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    भारत में बया की चार प्रजातियां मिलती है। बया वीवर (देशी बया), स्ट्रीक्ड वीवर (जालीदार बया), ब्लै ब्रेस्टेड वीवर (मोमिया चोच बया) और फिन्न वीवर (पहाड़ी बया)। इसमें पहाड़ी बया का वासस्थल तराई का जंगल व असम का काजीरंगा नेशनल पार्क ही माना जाता है। लेकिन, 1976 के बाद से दोबारा उत्तराखंड में नजर नहीं आने से पक्षी विशेषज्ञ व महकमा भी चिंतित था।

     

    23 जून को पहाड़ी बया तराई केंद्रीय के जंगल में एक बर्ड वाचर को नजर आई। जिसके बाद डीएफओ डॉ. अभिलाषा सिंह भी मौके पर पहुंची। जंगल में पहाड़ी बया के बीस घोंसले भी मिले। इसके अलावा पचास अलग-अलग तरह के पक्षी भी आसपास के इलाके में दिखे। जिसके बाद डीएफओ ने वनकर्मियों को घोंसलों के आसपास गश्त के साथ निगरानी के निर्देश भी दिए।

     

    तराई केंद्रीय डिवीजन की डीएफओ डॉ. अभिलाषा सिंह, ने बताया कि 1976 के बाद पहाड़ी बया तराई के जंगल में दोबारा नजर आई है। हम उसके वासस्थल को लेकर पूरी गंभीरता बरत रहे हैं। स्टाफ को निर्देशित किया गया है कि घोंसलों व आसपास निगरानी में चूक न हो।

     

    उत्तर प्रदेश में बन रहा पहला प्रजनन केंद्र

    पहाड़ी बया को बचाने के लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग मेरठ में एक खास प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। यहां दुनिया का पहला बया प्रजनन केंद्र बनाया जा रहा है। मुंबई की एक सोसायटी को जिम्मा सौंपा गया है। जो बया की चारों प्रजातियों पर रिसर्च कर रही है। ऐसे में उत्तराखंड में भी संरक्षण को लेकर पहल की जरूरत है।


    घटती जा रही पहाड़ी बया की संख्या 

    दुनिया भर में पहाड़ी बया केवल भारत और एक-दो जगहों पर नेपाल में पाई जाती है। उत्तर भारत में पिछले 15 सालों में पहाड़ी बया की जनसंख्या में 84.1 से 95.8 फीसद की गिरावट आई है। साल 2001 में बर्ड लाइफ इंटरनेशनल ने 1866 से 2000 तक के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर देश में पहाड़ी बया के 17 लोकेशन बताए थे। बर्ड लाइफ इंटरनेशनल की स्टडी में देश में पहाड़ी बया के 47 लोकेशन मिले। इनमें से साल 2012 से 2017 के दौरान हुए पांच सर्वे में अब केवल नौ जगहों पर ही पहाड़ी बया मिले थे। 

     

    कौवे खा जाते हैं अंडे 

    साल 2016-17 के दौरान हुए सर्व में नौ में से तीन नए जगह चिन्हित किए गए। इनमें दो पश्चिम उत्तर प्रदेश के हरेवली बांध और भगवानपुर रेनी हैं। अन्य चिड़िया जहां अब अपने घोंसले छिपाकर बनाती हैं वहीं पहाड़ी बया अपने घोसले पेड़ों पर खुले में बनाती है। इसके अंडे कौवे खा जाते हैं। छोटी पक्षी होने के कारण यह अपना बचाव भी नहीं कर पाती है। यह ज्यादातर अपने घोंसले सेमुल के पेड़ों पर बनाती है। कौवों के अंडे खाने और इन पेड़ों की संख्या कम होने के कारण ही पहाड़ी बया प्राय लुप्त प्रजाति बन गई है।

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