हल्द्वानी, [गणोश जोशी]: बेड पर चादर हल्की सी मुड़ी हो या फिर स्कूल बैग में किताबें क्रम से न रखी हों तो छह वर्षीय छात्र का मन उचट जाता। वह परेशान हो जाती। चिढ़ने के साथ माता-पिता को डांटने लगती। यह स्थिति किसी एक दिन की नहीं थी, बल्कि आए दिन उसका यही व्यवहार हो गया। इतनी छोटी सी बच्ची के इस व्यवहार से माता-पिता परेशान हो गए। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जब उन्होंने डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय के मनोरोग विभाग में संपर्क किया तो शुरुआत में डॉक्टर भी व्यवहार को नहीं समझ सके।

क्लीनिकल साइकलोजिस्ट डॉ. युवराज पंत ने बच्चे के व्यवहार का अध्ययन किया। जब उन्होंने कई दिन तक बच्ची के व्यवहार का अध्ययन किया तो पता चला कि शहर के एक प्रतिष्ठित परिवार की बेटी ऑब्सेसिव कंपुल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) नामक बीमारी की गिरफ्त में हैं। कम उम्र में ओसीडी होने पर एसटीएच के चिकित्सक भी आश्चर्य में पड़ गए। साइक्लॉजिकल जांच के बाद बिहेवियरल थेरेपी शुरू की गई। साथ ही वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. एससी गोदियाल ने दवाइयों से इलाज शुरू किया। अब बच्ची की हालत में सुधार हो रहा है।

चिंता करने वाली बीमारी से आराम मिलने लगा। डॉ. पंत बताते हैं कि अभी तक ओसीडी की बीमारी से ग्रस्त 12 वर्ष से अधिक उम्र के लोग ही आ रहे थे, लेकिन अब कम उम्र की बच्ची में यह रोग देख आश्चर्य हो गया है।


घबराएं नहीं अभिभावक सावधानी से निपटें
डॉ. युवराज पंत बताते हैं कि अगर बच्चे में ओसीडी के लक्षण नजर आएं तो घबराना नहीं चाहिए। बच्चे को प्यार से समझाएं। डांटे-फटकारें नहीं। अगर नहीं मानते हैं तो किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ की सलाह लें। सही समय पर उपचार कराने से मर्ज का उपचार संभव है।

ये हैं बीमारी के प्रमुख कारण
ओसीडी आनुवांशिक भी है। अगर माता-पिता को यह बीमारी है, तो बच्चों में भी होने की संभावना रहती है। जैविक कारणों में दिमाग में सिरोटोनिन नाम के रसायन के असंतुलन की वजह से हो सकता है। अचानक जीवन में बदलाव आने, जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ने, गहरा सदमा लगने आदि कारणों से यह बीमारी हो सकती है।

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ये हैं ओसीडी के लक्षण
- बार-बार एक ही काम करना
-चाबी लगाने पर बार-बार चेक करना
-बार-बार हाथ धोना
-चीजों को बार-बार व्यवस्थित करना
-हर चीज को लेकर असहज रहना
-व्यवहार पर कंट्रोल नहीं करना पाना

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किशोर भी परेशान
एसटीएच में ओसीडी से ग्रस्त 11 वर्ष से 18 वर्ष के किशोर भी पहुंच रहे हैं। कुमाऊं भर से ऐसे किशोरों की संख्या अब प्रतिवर्ष 15 से अधिक हो गई है।

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Posted By: sunil negi

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