Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    भयानक भूस्खलन का दंश झेल चुके नैनीताल में एक और खतरे की आहट, डरा रहा मानसून

    Updated: Wed, 09 Jul 2025 04:04 PM (IST)

    Nainital Rains नैनीताल शहर का ड्रेनेज सिस्टम बिगड़ने से भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है। अंग्रेजों द्वारा निर्मित नाला तंत्र अब अतिक्रमण और रखरखाव की कमी के कारण कमजोर हो रहा है। अवैध निर्माणों ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है जिससे वर्षा का पानी सड़कों पर बह रहा है और भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है।

    Hero Image
    नैनीताल ड्रेनेज सिस्टम की विफलता से बढ़ा भूस्खलन का खतरा। जागरण

    नरेश कुमार, नैनीताल। बसासत के करीब पांच दशक बाद भयानक भूस्खलन का दंश झेल चुके नैनीताल शहर के अस्तित्व को बचाने में ड्रेनेज सिस्टम का अहम योगदान रहा। अंग्रेजों ने तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए शहर को समृद्ध नाला तंत्र दिया। जिसके बूते भूगर्भीय दृष्टि से अति संवेदनशील होने के बावजूद आज भी शहर का अस्तित्व बना हुआ है।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    बेतरतीब निर्माण कार्य, छोटे व बड़े नाले मलबे से पटे होने के कारण शहर का ड्रेनेज सिस्टम बिगड़ रहा है। यही कारण है कि नाली विहीन हो चुके कई क्षेत्रों में वर्षा का पानी सड़कों व रास्तों से होकर बह रहा है। जिससे भविष्य में आपदा से इनकार नहीं किया जा सकता।

    इतिहासकार प्रो अजय रावत बताते है कि शहर में पहला भूस्खलन 1867 में बीडी पांडे अस्पताल के पीछे चार्टन लॉज, मार्शल कॉटेज क्षेत्र में हुआ। संयोग से उस समय आबादी क्षेत्र कम होने के कारण कोई बड़ी हानि नहीं हुई। इसके अगले वर्ष अंग्रेजों ने हिल साइड सेफ्टी कमेटी का गठन किया। जिसके विशेषज्ञों ने अध्ययन कर पाया कि झील का कैचमेंट क्षेत्र चारों ओर की पहाड़िया है। जिसमें वर्षा जल की निकासी का कोई सिस्टम नहीं है।

    कमेटी विशेषज्ञ अध्ययन व समस्या के निदान खोजने में जुटे ही थे कि 1880 में आलमा की पहाड़ी पर भयानक भूस्खलन हुआ। जिसमें 151 लोगों ने जान गवाई। जिसके बाद 1880 से 1885 तक अंग्रेजों ने शहर में करीब 79 किमी लंबे 68 नालों का निर्माण कराया। जिनमें से कुछ को छोड़ अन्य को झील से जोड़ा गया। साथ ही इन नालों से जुड़ी करीब 237 छोटी ब्रांच नालियों का भी निर्माण किया गया। इस नाला तंत्र ने शहर में भूस्खलन के खतरों को कम किया।

    मगर ईधर 70 के दशक के बाद शहर में पर्यटन गतिविधियों का विस्तार हुआ तो शहरवासियों ने ही पूर्व में लगे प्रतिबंध भुला दिये। अवैध निर्माणों में तेजी से बढ़ोतरी होने से शहर कंक्रीट में तब्दील होता रहा। नतीजतन झील से जुड़े कई नालों के मुहानों पर अतिक्रमण हो गया है तो इनसे जुड़े दर्जनों छोटे नाले अतिक्रमण की भेंट चढ़कर अपना अस्तित्व खो चुके है।

    भूस्खलन को न्यौता दे रहा बिगड़ता ड्रेनेज सिस्टम

    ब्रिटिशकाल से ही शहर में वर्षा जल की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था थी। आबादी क्षेत्रों से छोटी नालियों से होते हुए वर्षा का पानी बड़े नालों और वहां से झील तक जाता था। वर्तमान में छोटी नालियों के ऊपर अतिक्रमण होने व कई नालियों की नियमित सफाई नहीं होने से पानी की निकासी बड़ी समस्या बन गई है।

    ऊपरी क्षेत्र से तेजी से सड़क व रास्तों से बहता हुए पानी का रिसाव पहाड़ी पर हो रहा है। जो भूस्खलन को न्योता दे रहा है। प्रो रावत ने बताया कि कुछ दशक पूर्व ठंडी सड़क क्षेत्र के नालों में वर्ष भर पानी बना रहता था। मगर अयारपाटा क्षेत्र में निर्माण कार्य के दौरान लोगों ने इन नालों के प्रवाह को ही मोड़ दिया है। जिससे अब इन नालों में मानसून में भारी वर्षा के दौरान ही पानी दिखता है।

    जिम्मेदार मौन, स्थानीय लोगों को भी दर्द नहीं

    प्रो रावत बताते है कि झील से जुड़े क्षेत्रों में तो नालों की सफाई होती है, मगर अतिक्रमण की जद में आए नालों के मुहानों की ओर जिम्मेदारों ने कभी ध्यान नहीं दिया। शहरवासी ही शहर के अस्तित्व को खतरे में डालकर अवैध निर्माण करते गए। जिस कारण बीते एक दशक में भूस्खलन की कई घटनाए हो चुकी है।