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    ब्रितानी हुकूमत से टकराए थे मोती सिंह

    By JagranEdited By:
    Updated: Sat, 22 Aug 2020 06:34 AM (IST)

    ब्रितानी हुकूमत से देश आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता सेनानी मोती सिंह नेगी ने काफी संघर्ष किया। वह किशोरावस्था में ही जंग आजादी में कूद गए थे।

    ब्रितानी हुकूमत से टकराए थे मोती सिंह

    संवाद सहयोगी, रामनगर : ब्रितानी हुकूमत से देश आजाद हो और देशवासी खुली हवा में सांस ले सकें इसी हसरत को लेकर किशोरावस्था में ही जंगे आजादी में कूदने वाले योद्धा मोती सिंह नेगी शुक्रवार को चिरनिद्रा में लीन हो गए। स्वंतत्रता सेनानी मोती सिंह नेगी रामनगर ही नही बल्कि कुमाऊं में भी जाना-पहचाना नाम था। जीवन के अंतिम दिनों तक भी वह जनसमस्याओं के निदान के लिए समाज के हर तबके की मदद करने मे कभी पीछे नहीं रहे। यही वजह है कि आज हर कोई उनके निधन का समाचार सुनकर दुखी है। आजादी के आंदोलन के दौरान उन्होंने ब्रितानी हुकूमत से जमकर लोहा लिया था।

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    पांचवी की पढ़ाई छोड़ कूदे थे स्वतंत्रता आंदोलन में :

    99 वर्षीय वयोवृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोती सिंह नेगी मूल रूप से अल्मोड़ा जनपद के ताड़ीखेत विकासखंड के ग्राम कनोली के रहने वाले थे। पाचवी कक्षा से पढ़ाई लिखाई छोड़कर वह देश की आजादी के आंदोलन में कूद गए थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन के दौरान तमाम यातनाएं झेली, घर परिवार को छोड़कर जेल में भी बंद रहे। कई बार बिट्रिश हुकूमत ने उन्हें माफीनामा लिखकर छोड़ देने का प्रलोभन दिया मगर उन्होंने माफी मांगने से साफ इन्कार कर दिया। वह अक्सर कहते थे कि बड़े जतन से देश को आजादी मिली है इसका सरकार व नयी पीढ़ी सही उपयोग करे तभी देश उन्नति करेगा।

    जोश के साथ सुनाते थे गौरव गाथा : देश की आजादी के आंदोलन की कहानी को वह पूरे जोश के साथ सुनाया करते थे। बताते थे कि वह खुद रानीखेत से जुलूस के साथ झासी पहुंच गए। 23 अगस्त 1942 को महात्मा गाधी ने लोगों से आदोलन में हिसा न करने की अपील की थी। झासी में बड़े नेताओं के नेतृत्व में जुलूस निकाला तो उन्हें और उनके साथियों को झासी की जेल में बंद कर दिया गया। पकड़े गए लोगों को छोड़ने के लिए माफीनामा लिखने को कहा गया लेकिन सभी ने माफीनामा लिखने को मना कर दिया। एक सितंबर 1942 को सभी को छह माह की सजा सुनाई गई। जेल में आंदोलनकारियों को काफी प्रताड़ित किया जाता था। उनके साथ अपराधी जैसा व्यवहार किया गया। इसके विरोध में उन्होंने सात दिन तक जेल में अनशन किया और भूखे रहे। 27 फरवरी 1943 को वह जेल से छूटकर आए। इसके बाद भी कई जगह आदोलन करते रहे। आजादी के दीवानों के आगे अंग्रेजों को आखिरकार झुकना पड़ा और 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिल गई। वह अक्सर कहा करते थे कि कड़े संघर्ष और बलिदानों से यह आजादी मिली है। इस आजादी को बनाए रखने के लिए युवको को हिसा नहीं रचनात्मक कामों पर ध्यान लगाना होगा। सही मायनों में तभी आजादी का सपना पूरा होगा।

    राष्ट्रपति व पूर्व प्रधनमंत्री कर चुकी हैं सम्मानित : वयोवृद्ध मोती सिंह नेगी को वर्ष 2008 में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने दिल्ली बुलाकर सम्मानित किया। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गाधी ने भी उन्हें ताम्रपत्र भेंटकर सम्मानित किया गया था।