हल्द्वानी, राजेश वर्मा : Mahatma Gandhi Birth Anniversery : काैसानी। बागेश्वर से करीब 38 किमी दूर बसा यह जगह पर्यटन और प्रकृति की खूबसूरती से भरपूर बेहद रमणीय स्थल है। मगर इसकी पहचान बनी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कारण। 1929 में महात्मा गांधी के चरण कुमाऊं यात्रा के दौरान यहां पड़े थे। इस दौरान वह यहां की शांति और प्राकृतिक सुंदरता के इतनी मुरीद हो गए कि दो दिनों के प्रवास की योजना टालकर वह 14 दिन ठहर गए।

दो की जगह ठहर गए 14 दिन

बापू का कौसानी (Kausani) प्रेम किसी से छुपा नहीं रहा। कहते हैं कि जब भी उनका स्वास्थ्य खराब होता था, उनके कदम कौसानी की तरफ बढ़ चलते थे। पहली बार वहा यहां 1929 में आए थे। वह यहां डाक बंगले में ठहरते थे। डाक बंगला एक अतिथि गृह था, जो एक चाय बागान के मालिक की थी। उन्हीं की प्रार्थना पर वह यहां दो दिन ठहरने काे राजी हुए। यहां ठहने के दौरान पहली सुबह जब गांधीजी योग करने के लिए अतिथि गृह से बाहर आए तो उन्हें हिमालय के दर्शन हुए और वो मंत्रमुग्ध रह गए।

यही लिखी थी अनासक्ति योग

यहां की शांति भी उन्हें इतनी रास आ गई कि वह 14 दिन ठहर गए। इसी दौरान बापू ने एक किताब लिखनी शुरू की, जिसे उन्होंने महज 14 दिनों में ही पूरी कर दी थी। इस किताब को बापू ने नाम दिया अनासक्ति योग (Anasakti Yoga)। इस किताब में गांधीजी गीता के श्लोकों का हिंदी अनुवाद किया है। गांधीजी इस जगह से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कौसानी को भारत का स्विटजरलैंड (India's Switzerland) कह डाला।

बापू की यादों का संग्रह है यहां

आजादी के बाद 1966 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी ने इस डाक बंगले को उत्तर प्रदेश महात्मा गांधी स्मारक निधि को सौंप दिया और इसे गांधीजी की किताब के नाम पर नाम दिया गया अनासक्ति आश्रम (Anasakti Ashram Kausani))। इस आश्रम में गांधीजी के जीवन से जुड़ी यादें, चीजें, किताबों और तस्वीरों का संग्रह है। यहां छोटा सा प्रार्थनास्थल भी है, जहां गांधी दर्शन के साथ-साथ रोज सुबह-शाम प्रार्थना सभा भी होती है। यहां गांधी जी के तीन बंदरों की मूर्तियां भी हैं और आसपास बेहद शांत और सौम्य वातावरण में घिरे चाय बागान हैं। आश्रम के बाहर पार्किंग की जगह पर एक बड़ा सा बोर्ड लगा है जिस पर गांधी के पूरे परिवार की जानकारी मौजूद है। इसमे गांधी के परदादा से लेकर गांधी के पोतों तक की संपूर्ण जानकारी है।

आज भी बापू के होने का होता है अहसास

1929 में महात्मा गांधी कुमाऊं की यात्रा पर आए। कुली बेगार प्रथा के खिलाफ चले आंदोलन की सफलता देखकर ही पहली बार बापू यहां पहुंचे थे। उनका उद्देश्य क्षेत्रीय स्तर पर राष्ट्रीय अांदोलन को मजबूती प्रदान करना था। 22 दिनों की अपनी इस यात्रा में उन्होंने कुमाऊं के 26 जगहों पर भाषण दिया। मगर अधिकांश समय कौसानी में गुजारा। इस यात्रा के बाद कौसानी का डाक बंगला बापू की यादों का संग्रहालय बन गया। कुमाऊं के स्वतंत्रता सेनानी यहां आकर प्रेरणा और शक्ति लेते। आज भी यह जगह बापू के होने का अहसास कराता है।

Edited By: Rajesh Verma

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