नैनीताल, जेएनएन : देवभूमि में भोलेनाथ की पूजा-अर्चना के लिए बड़ी तादाद में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। खासकर जब महाशिरात्रि जैसा दिन हो तो शिवालयों में भक्‍तों का रेला उमड़ पड़ता है। आज कुमाऊं के ऐसे ही शिवालयों की बात होगी जिनमें भोलेनाथ के भक्‍तों की अगाध श्रद्धा है।

क्रांतेश्वर महादेव मंदिर, चम्पावत

क्रांतेश्वर महादेव मंदिर भगवान शिव का पवित्र मंदिर है। जो चम्पावत शहर के पूर्व में एक ऊंचे पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। जो शहर से 6 किमी दूरी व समुद्र तल से 6000 मीटर की ऊंचाई पर बना है। क्रांतेश्वर महादेव मंदिर को स्थानीय लोग कणदेव और कुरमापद नाम से भी संबोधित करते हैं। मंदिर अनोखी वास्तुशिल्प से निर्मित अद्भुत मंदिर है।

इतिहास

धार्मिक मान्यता के अनुसार क्रांतेश्वर महादेव मंदिर की पहाड़ी में भगवान विष्णु ने कूर्मावतार लिया था। इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार कूर्म पर्वत के नाम से कुमाऊं शब्द बना है। कुमाऊं शब्द संस्कृत के कूर्म शब्द का ही अपभ्रंश है। यह माना जाता है कि भगवान विष्णु के पद चिन्ह आज भी इस स्थल में विराजित हैं । स्कंद पुराण के मानसखंड में भी कूर्म नाम के पर्वत का वर्णन है।

विशेषता

क्रांतेश्वर महादेव मंदिर की उल्लेखनीय ऊंचाइयों से हिमपातित हिमालय के सुंदर दृश्य का अनुभव प्रदान होता है। भक्त आशीर्वाद लेने के लिए भगवान कणदेव को दूध, दही और देशी घी देते हैं और अपनी इच्छाओं एवं मनोकामना को पूरा करने के लिए प्रार्थना करते हैं। यह प्राचीन मंदिर है जो वास्तुकला की याद दिलाती है।

बनखंडी महादेव मंदिर, बनबसा

बस स्टैंड से लगभग पांच किलोमीटर दूर मझगांव में शारदा नहर किनारे पर बना बंनखंडी महादेव मंदिर क्षेत्र में प्रसिद्ध शिव मंदिरों में से एक है। यहां क्षेत्र के अलावा पड़ोसी देश नेपाल से श्रद्धालु पहुंचते है और शिव के चरणों में शीश नवाते हैं। शिवरात्री के दिन से दो दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। मान्यता है कि मंदिर के प्रांगण में एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे पूर्व में लोगों द्वारा पूजा अर्चना की जाती थी जिसके बाद उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती थी। कहा जाता है कि अंग्रेजों के समय में भी धनुषपुल निर्माण के दौरान भी कभी कोई विपत्ती आने पर अंग्रेज भी स्थानीय लोगों के साथ यहां पूजा अर्चना किया करते थे।

बालेश्वर महादेव मंदिर, चम्पावत

बालेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। जिसका निर्माण देवी देवताओं की नक्काशी युक्त पत्थरों द्वारा किया गया है। जो शिल्प कला का एक अद्भुत प्रतीक है। मुख्य बालेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर परिसर में दो अन्य मंदिर भी उपस्थित हैं। जिसमें एक रत्नेश्वर व दूसरा मंदिर चम्पावती दुर्गा को समर्पित है। पूरे मंदिर समूह में आधा दर्जन से ज्यादा शिवलिंग स्थापित हैं। मुख्य शिवलिंग स्फुटिक का है। बालेश्वर मंदिर आस्था के साथ साथ पर्यटन का केंद्र बना हुआ है। मंदिर की दीवारों में कई प्रकार की मानव मुद्राएं, देवी देवताओं की सुंदर मूर्तियां पत्थरों पर उकेरी गई हैं। बालेश्वर मंदिर को राष्ट्रीय विरासत स्मारक के रूप में 1952 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित किया था।

इतिहास

चंद शासकों ने 13वीं सदी में बालेश्वर मंदिर की स्थापना की थी। मंदिर में मौजूद शिलालेख के अनुसार यह मंदिर 1272 में बना था। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 10वीं या 12वीं शताब्दी के मध्य काल में हुआ था। जिसे जगन्नाथ मिस्त्री ने बनाया था। कहा जाता है कि जगन्नाथ मिस्त्री के द्वारा मंदिर निर्माण से चंद शासक काफी प्रसन्न हुए और ऐसी कलाकृति कहीं और न बनाई जा सके इसके लिए जगन्नाथ मिस्त्री का एक हाथ कटवा दिया था।

मानेश्वर महादेव मंदिर, चम्पावत

कूर्म नगरी की श्यामराज चोटी के समानांतर स्थापित मानेश्वर धाम भक्तों की झोली भरता है। यहां गुप्त नौली के जल से स्नान करने और मंदिर के दर्शन मात्र से लोगों को निरोगी काया का वरदान मिलता है। अर्जुन के गांडीव धनुष से उत्पन्न यह धाम अपनी चमत्कारिक मान्यताओं के लिए सदियों से लोगों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। नवरात्र के साथ ही सावन में यहां भक्तों का रेला उमड़ पड़ता है। वर्ष 1962 से पूर्व मानेश्वर धाम कैलाश मानसरोवर यात्रा का मुख्य पड़ाव रहा है। चंदवंशीय राजा निर्भय चंद ने सातवीं सदी में मंदिर को भव्य स्वरूप दिया।

इतिहास 

कहा जाता है कि जब पांडव पुत्र माता कुंती के साथ इस क्षेत्र में थे तो उन्होंने इसी स्थान पर पांडु का श्राद्ध किया था और अर्जुन ने गांडीव धनुष से बाण मार कर मानसरोवर की जलधारा यहां स्फुटित की थी। जिस स्थान से जल की धारा निकली उसे गुप्त नौली के नाम से जाना जाता है और उसका जल यहां निर्मित एक बावड़ी में एकत्र होता है। इस जल से स्नान करने पर पुण्य लाभ के साथ ही कई रोग व विकार दूर होते हैं। शिवलिंग की पूजा से मनवांछित फल मिलता है। निसंतान दंपत्तियों की झोली इस दरबार में भर जाती है।

ऋषेश्वर महादेव मंदिर, चम्पावत

लोहाघाट नगर के लोहावती नदी तट पर  देवदार के हरेभरे पेड़ों के बीच स्थित ऋषेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। यहां वर्ष भर पूजा अर्चना का कार्य चलता रहा है। क्षेत्र के लोग की प्रतिदिन मंदिर में सुबह से आवाजाही रहती है। इस शिव मंदिर में यज्ञोपवीत संस्कार, शिव पूजा होती  है। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग मंदिर पहुंचकर पूजा अर्चना भी करते है।

इतिहास

मंदिर के पुजारी देव सिंह पुजारी के मुताबिक पूर्व में ऋषेश्वर महादेव मंदिर में कैलाश मानसरोवर यात्रियों का एक पड़ाव होता था। कैलाश मानसरोवर के यात्री यहां विश्राम करते थे। बताया जाता है कि पूर्व में कली गांव से देव डांगर शिवालय के लिए आते थे। एक अंगे्रज ने मीनाबाजार में देव डांगरों के रास्ते में लोहे को गेट बनाकर ताला लगा दिया था। देव डांगरों ने अक्षत व फूल मारे तो ताला खुल गया। देवताओं की शक्ति का देख कर उसने मंदिर मे चांदी की टोप चढ़ाई। शिव मंदिर में दूध व जलाभिषेक  करने में मनचाहा फल की प्राप्ति होती है। शिव मंदिर में प्रति दिन खीर पूरी का भोग लगाया जाता है। हर माह की चर्तुदशी को मंदिर में भोग का आयोजन किया जाता है। जिसमें नगर सहित ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी शामिल होते है।

विभांडेश्वर तीर्थ, द्वाराहाट

विभांडेश्वर महादेव मंदिर का बखान स्कंदपुराण के मानसखंड में भी मिलता है। विश्राम के दौरान यहां शिव का दायां हाथ पड़ा था। कहा जाता है कि मंदिर में मौजूद त्रिजुगी धूनी त्रेतायुग से लगातार जलायमान है। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 11वीं सदी में कत्यूरी शासकों द्वारा किया माना जाता है। सुरभि, नंदिनी और गुप्त सरस्वती की त्रिवेणी पर स्थित इस मंदिर के लिए चंद राजा उद्यौतचंद ने मंदिर को गूंठ प्रदान की। इस तीर्थ स्थल पर चंद राजाओं के सेनापति कल्याण चंद की पत्नी कलावती देवी को कुमाऊं की प्रथम और अंतिम सती होने का गौरव प्राप्त है। श्रावण मास में विभांडेश्वर में भक्तों की भारी भीड़ रहती है। चैत्र मास के अंतिम गते की रात्रि को यहां बिखोती मेला लगता है। हिमालय से पहुंचे स्वामी लक्ष्मीनारायण ने 1945 में यजुर्वेद, 1946 में ऋग्वेद, 1947 में सामवेद तथा 1952 में अथर्ववेद यज्ञ संपन्न करवाए। पं. हरीश चंद्र पुजारी ने बताया कि विभांडेश्वर मंदिर में पूरे वर्ष श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। लेकिन श्रावण मास में यहां की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान भोलेनाथ की कृपा साक्षात बरसने के कारण लोगों की गहरी आस्था है।

भगवान शिव की पूजा को जागेश्वर में उमड़ती है भीड़

भगवान शिव की पूजा के लिए जागेश्वर धाम पूरे विश्व में विख्यात है। शिवरात्रि के मौके पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और वह यहां तरह-तरह के धार्मिक आयोजन करवा कर भगवान शिव का आर्शीवाद प्राप्त करते हैं। जागेश्वर धाम की बात करें तो स्कंध पुराण के मानस खंड में इसका वर्णन मिलता है। जागेश्वरधाम से दो किमी पश्चिम की ओर स्थित दंडेश्वर वन में ऋषि मुनियों ने शिव की तपस्या की थी। उसी काल में ऋषि पत्नियां कंदमूल फल लाने वन में गई जहां उन्हें शिवजी दंडी रूप में वस्त्र विहीन दिखाई दिए। शिव के नग्न रूप को देखकर ऋषि पत्नियां मूर्छित हो गईं। इसके बाद ऋषि मुनियों ने जब उनकी खोज की तो स्त्रियों की हालत देखकर उन्होंने दंडी रूप शिव पर पत्थर मारने शुरू कर दिए। भगवान शिव के क्रोध के बाद ऋषि मुनि तीनों लोकों में भागते रहे और उन्होंने ब्रम्‍हा और विष्णु की शरण ली। ब्रम्‍हा और विष्णु ने ऋषियों को शक्ति की उपासना करने का सुझाव दिया। देवी की उपासना में ऋषियों ने यज्ञ किया। शक्ति में ही शिवलिंग स्थापित हो पाया। जिस स्थान पर यह लिंग स्थापित हुआ उसी का नाम जागेश्वर पड़ा। इसी जागेश्वरधाम को 12 ज्योतिर्लिंगों में नागेश ज्योतिर्लिंग माना गया है।

जागेश्वरधाम, अल्‍मोड़ा

जनपद अल्मोड़ा से 35 किमी दूर देवदार की सुरम्य वादियों में स्थित जागेश्वरधाम द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है। देश के ही नही विदेशों से भी हजारों पर्यटक और श्रद्धालु प्रतिमाह यहां दर्शन करने को आते हैं। शिवरात्रि के मौके पर यहां एक माह का विशाल मेला लगता है। जागेश्वरधाम में पाषाण शैली के भव्य देवालयों का निर्माण कत्यूरी व चंद राजाओं ने करवाया था। यहां पर मंदिरों में बड़े बड़े पत्थरों में पशु पक्षियों व देवी देवताओं की अति सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं। वास्तुशिल्प एवं आलेखन के क्रम में लकुलीश व सकुलीश सबसे प्राचीन मंदिर माने गए हैं। कालांतर में जागनाथ, महामृत्युंजय, कुबेर, पुष्टी देवी, नव दुर्गा, कालिका व दंडेश्वर मंदिरों का निर्माण माना जाता है। इस किमी क्षेत्र में सवा सौ से अधिक मंदिरों का समूह होना इस क्षेत्र की विशेषता है।

ये है मान्‍यता

इस धाम में निसंतान स्त्रियां अगर अखंड दीपक प्रज्वलित करती है अथवा इस धाम में भगवान भोले शंकर की पूजा पार्थिव पूजन के द्वारा की जाती है तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है ऐसी मान्यता है। माना गया है कि सर्वप्रथम शिवार्चन जागेश्वरधाम में किया जाता है तत्पश्चात अपने घरों में भी शिवार्चन किया जा सकता है। शिवरात्रि के मौके पर इस मंदिर में शिवार्चन और पार्थिव पूजा के लिए यहां देश विदेश के लोग उमड़ते हैं।

ब्रदेश्वर मंदिर, अल्‍मोड़ा

अल्मोड़ा नगर के माल रोड पर भगवान शिव के ब्रदेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया है। यह मंदिर नगर की पचास हजार से अधिक की आबादी की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर का निर्माण नगर के एक जोशी परिवार के पूर्वजों ने वर्ष 1843 के आसपास कराया था। शिवरात्रि के मौके पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। लोग यहां भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा अर्चना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि बद्रेश्वर मंदिर में भगवान शिव का पूजा अर्चना करने से मन की मुराद पूरी होती है। इस मंदिर का निर्माण स्थानीय पत्थरों से किया गया है। जबकि मंदिर के ऊपर का हिस्सा लकड़ी से निर्मित है।

बाघ रूप में है विराजमान है भगवान भोले

ब्रदेश्वर मंदिर में अर्चना से मिलता है शिव का आर्शीवाद

अल्मोड़ा नगर के माल रोड पर भगवान शिव के ब्रदेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया है। यह मंदिर नगर की पचास हजार से अधिक की आबादी की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर का निर्माण नगर के एक जोशी परिवार के पूर्वजों ने वर्ष 1843 के आसपास कराया था। शिवरात्रि के मौके पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। लोग यहां भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा अर्चना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि बद्रेश्वर मंदिर में भगवान शिव का पूजा अर्चना करने से मन की मुराद पूरी होती है। इस मंदिर का निर्माण स्थानीय पत्थरों से किया गया है। जबकि मंदिर के ऊपर का हिस्सा लकड़ी से निर्मित है।

यहां बाघ के रूप में विराजे हैं भोलेनाथ

शिव धाम के रुप में बागेश्वर पूरे देश ही नही वरन विदेशों में भी विख्यात हैं। अपने में इतिहास और सुनहरे अतीत को संजोए हुए है। स्कन्द पुराण के मानस खंड में इसका जिक्र है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार बागेश्वर शिव की लीला स्थली है। इसकी स्थापना भगवान शिव के गण चंडीस ने महादेव की इच्छानुसार 'दूसरी काशी' के रूप में की। बाद में शंकर-पार्वती ने अपना निवास बनाया। स्कन्दपुराण के ही अनुसार मार्कण्डेय ॠषि यहां तपस्या कर रहे थे। ब्रह्र्मिष वशिष्ठ जब देवलोक से विष्णु की मानसपुत्री सरयू को लेकर आए तो मार्कण्डेय ॠषि के कारण सरयू को आगे बढऩे से रुकना पड़ा। ॠषि की तपस्या भी भंग न हो और सरयू को भी मार्ग मिल जाए। इसलिए पार्वती ने गाय और शिव ने व्याघ्र का रूप धारण किया। इसके बाद ॠषि से सरयू को मार्ग दिलाया। शिव का व्याघ्र रुप, व्याघ्रेश्वर कहलाया जो बाद में बागेश्वर बन गया। यह स्थान पौराणिक काल से ही ऋषियों व मुनियों की तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध रही है। हर वर्ष होने वाले महाशिवरात्रि को इसका महात्म देखने को मिलता हैं। यहां हजारों की तादात में शिवभक्त पहुंचते है और मन्नत मांगते हैं।

तीर्थराज के रूप में पूजा जाता है बागेश्वर

उत्तराखंड में बागेश्वर की मान्यता 'तीर्थराज' की है । भगवान शंकर की इस भूमि में सरयू और गोमती का संगम होने के अतिरिक्त लुप्त सरस्वती का भी मानस मिलन है। नदियों की इस त्रिवेणी के कारण ही बागेश्वर को प्रयाग के समकक्ष तीर्थ माना जाता है। शिव भक्त थे कत्यूरी शासक बागेश्वर में एक और शिव धाम है बैजनाथ मन्दिर स्थित है। बैजनाथ में गोमती और गरुड़ गंगा बहती हैं। संगम के किनारे ही सन 1150 का बना हुआ मन्दिर समूह है जिसे कत्यूरी राजाओं ने बनाया था। राजा नरङ्क्षसह देव ने 850 वी शताब्दी में बैजनाथ नगर बसाया। यह स्थान कत्यूरी शासकों की राजधानी भी थी। इसे काॢतकेयपुर के नाम से भी जाना जाता है। यहां पत्थर के बने हुए कई मन्दिर हैं जिनमें मुख्य मंदिर भगवान शिव का है। बैजनाथ उत्तराखंड का काफी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। कौसानी से महज 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बैजनाथ गोमती नदी के तट पर स्थित है। पर्यटकों के लिए यहां का सर्वाधिक आकर्षण के केन्द्र 12वीं सदी में निॢमत शिव, गणेश, पार्वती, चंडिका, कुबेर, सूर्य मंदिर हैं।

जागेश्वर

भगवान शिव की पूजा के लिए जागेश्वर धाम पूरे विश्व में विख्यात है। शिवरात्रि के मौके पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और वह यहां तरह तरह के धार्मिक आयोजन करवा कर भगवान शिव का आर्शीवाद प्राप्त करते हैं। जागेश्वर धाम की बात करें तो स्कंध पुराण के मानस खंड में इसका वर्णन मिलता है। जागेश्वरधाम से दो किमी पश्चिम की ओर स्थित दंडेश्वर वन में ऋषि मुनियों ने शिव की तपस्या की थी। उसी काल में ऋषि पत्नियां कंद मूल फल लाने हेतु वन में गई जहां उन्हें शिवजी दंडी रूप में वस्त्र विहीन दिखाई दिए। शिव के नग्न रूप को देखकर ऋषि पत्नियां मूर्छित हो गई। तदुपरांत ऋषि मुनियों ने जब उनकी खोज की तो स्त्रियों की हालत देखकर उन्होंने दंडी रूप शिव पर पत्थर मारने शुरू कर दिए। भगवान शिव के क्रोध के बाद ऋषि मुनि तीनों लोकों में भागते रहे और उन्होंने ब्रंह्मïा और विष्णु की शरण ली। ब्रंह्मïा और विष्णु ने ऋषियों को शक्ति की उपासना करने का सुझाव दिया। देवी की उपासना में ऋषियों ने यज्ञ किया। शक्ति में ही शिवलिंग स्थापित हो पाया। जिस स्थान पर यह लिंग स्थापित हुआ उसी का नाम जागेश्वर पड़ा। इसी जागेश्वरधाम को 12 ज्योतिर्लिंगों में नागेश ज्योतिर्लिंग माना गया है।

सुरम्य वादियों में स्थित है जागेश्वरधाम

जनपद अल्मोड़ा से 35 किमी दूर देवदार की सुरम्य वादियों में स्थित जागेश्वरधाम द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है। देश के ही नही विदेशों से भी हजारों पर्यटक और श्रद्धालु प्रतिमाह यहां दर्शन करने को आते हैं। शिवरात्रि के मौके पर यहां एक माह का विशाल मेला लगता है। जागेश्वरधाम में पाषाण शैली के भव्य देवालयों का निर्माण कत्यूरी व चंद राजाओं ने करवाया था। यहां पर मंदिरों में बड़े बड़े पत्थरों में पशु पक्षियों व देवी देवताओं की अति सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं। वास्तुशिल्प एवं आलेखन के क्रम में लकुलीश व सकुलीश सबसे प्राचीन मंदिर माने गए हैं। कालांतर में जागनाथ, महामृत्युंजय, कुबेर, पुष्टी देवी, नव दुर्गा, कालिका व दंडेश्वर मंदिरों का निर्माण माना जाता है। इस किमी क्षेत्र में सवा सौ से अधिक मंदिरों का समूह होना इस क्षेत्र की विशेषता है

महाराष्ट्र व नागपुर के बेर भोलेनाथ को किए जाएंगे अर्पण

हल्‍द्वानी : भगवान शिव की आराधना का महापर्व शिवरात्रि को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। बाजारों में शिव को प्रिय लगने वाले फल बेर की आवक होने लगी है। इस बार महाराष्ट्र व नागपुर के बेरों से शिव का पूजन होगा। हल्द्वानी में पिपलेश्वर महादेव मंदिर, भैरव मंदिर व रामलीला मैदान स्थित के श्री संकटमोचन मंदिर में शिव का रुद्राभिषेक किया जाएगा। चार पहर की आरती होगी व बेल पत्रों से पूजन होगा।

ज्योतिषियों के अनुसार चार फरवरी को गृहस्थ लोग महाशिवरात्रि का उपवास रखेंगे और पांच फरवरी को वैष्णव के लिए व्रत होगा। शिव भक्तों के लिए यह पर्व बेहद महत्वपूर्ण हैं। राम लीला मैदान स्थित राममंदिर के महंत पंडित विवेक शर्मा ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार शिवरात्रि को भगवान शिव की उत्पत्ति का दिन माना जाता है। महाशिवरात्रि को शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। इसी वजह से इस दिन शिवलिंग की पूजा की जाती है। इसके अलावा अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं, जिसमें महाशिवरात्रि के दिन भगवान के रूद्र अवतार का वर्णन है।

मंदिरों के साथ ही शहर के बाजारों में शिवरात्रि की तैयारियां आरंभ हो गई है। फल मंडी में महाराष्ट्र व नागपुर से बेर पहुंचने लगे हैं। फल व्यापारी इरफान ने बताया कि शिवरात्रि पर पचास क्ंिवटल तक बेर की डिमांड है। बाजार में इस बार महाराष्ट्र के बेर की कीमत प्रतिकिलो 70 व नागपुर के बेर 40 से 50 रुपये प्रतिकिलो है। इसके अलावा अन्य फलों में भी शिवरात्रि के दौरान तेजी रहने की उम्मीद है।

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