किशोर जोशी, नैनीताल : Jumma Village Disaster : पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील अंतर्गत जुम्मा गांव व नेपाल के श्रीबगड़ में बादल फटने से तबाही की मुख्य वजह चट्टानों के छेद या रंध्र में जमा पानी है। भूमि के अंदर पानी में दबाव बढऩे से भूस्खलन हुआ। यह पूरा गांव ही मलबे के ढेर पर बसा हुआ है। इसलिए यहां पर नुकसान भी अधिक हुआ। ऐसा नहीं है कि बादल फटने या प्राकृतिक आपदाओं को टाला जा सकता है, लेकिन बेहतर इंजीनियरिंग के माध्यम से नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है।

यह कहना है एनएचपीसी धारचूला से जीएम भू-विज्ञानी पद से सेवानिवृत्त भास्कर पाटनी का। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के सदस्य पाटनी ने जागरण से बातचीत में बताया कि अतीत में आए भूस्खलन से जमा मलबे के ढेर पर जुम्मा गांव बसा है। जिसमें बड़ी बड़ी चट्टान, बोल्डर के साथ ही मिट्टी व अन्य मृदा कण मिले हुए हैं। बादल फटने से अत्यधिक मात्रा में पानी भूमि के अंदर जाकर मलबा साथ ले आया। भूमि के अंदर के दरारों से पानी चट्टानों के छेद या रंध्र में घुसा तो उससे नुकसान की तीव्रता बढ़ गई।

गांवों का भू सर्वेक्षण जरूरी

भू-विज्ञानी पाटनी के अनुसार श्रीबगड़ गांव नेपाल के नाले से आए मलबे ने काली नदी में अवरोध उत्पन्न करने से भूस्खलन हुआ। यहां नेपाल ने बांध बनाया है। बांध का पानी एनएचपीसी की तपोवन कॉलोनी में भर गया। यह पानी अवरोध के टूटते ही काफी नीचे स्तर पर आ गया। उन्होंने कहा कि 2013 से अब तक उत्तराखंड की आपदाओं के अवलोकन से पता चलता है कि नदी नालों के किनारे बसे गांव ही सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। अब वक्त आ गया है कि इन गांवों को चिह्नित कर उनका भू-विज्ञानी अवलोकन किया जाए और उसके बाद ही समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जाए। उन्होंने कहा कि डेंजर जोन में बसे गांवों का या तो विस्थापन किया जाए, या वहां इस तरह की इंजीनियरिंग की जाए कि नुकसान ना होने पाए।

जमीन नहीं मिली, तब बनी डेंजर जोन में कॉलोनी

भू-विज्ञानी पाटनी कहते हैं कि तपोवन में एनएचपीसी को जमीन ही नहीं मिली, इस वजह से उस स्थान पर कॉलोनी बनाई गई। उन्होंने कहा कि नदी, नाले व नालों के मुहानों पर अवरोध पैदा करने से प्राकृतिक घटनाओं से नुकसान अधिक हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं की मुख्य वजह धरती का तापमान बढऩा व जलवायु परिवर्तन का संकट है।

स्वरूप बदलते रहते हैं नदी-नाले

कुमाऊं विवि के भूगर्भ विज्ञान विभागाध्यक्ष रहे प्रो. सीसी पंत कहते हैं कि नदी-नाले स्वरूप बदलते रहते हैं। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने खतरों को देखते हुए नदी-नालों के किनारे बसासत नहीं की, लेकिन अब भू-विज्ञानी सलाह को दरकिनार कर मकान बनाने के साथ ही विकास की गतिविधियां की जा रही हैं, जिससे नुकसान होना स्वाभाविक है। जबकि होना यह चाहिए था कि निर्माण स्थल चयन से पहले भूमि के उपयोग से संभावित आपदा के मानचित्र का अध्ययन किया जाए।

 

Edited By: Skand Shukla