जागरण संवाददाता, द्वाराहाट (अल्मोड़ा): प्रागैतिहासिक व पौराणिक धरोहरों और साक्ष्यों के भंडार मंदिरों की नगरी (द्वाराहाट) अब शिव के 28वें अवतार लकुलीश की दुर्लभ मूर्ति मिलने से सुर्खियों में आ गई है। नगर से करीब 12 किमी दूर तकुल्टी में कत्यूरकालीन जिस मंदिर में श्रद्धालु शिव के महायोगी स्वरूप का पूजन करते आए हैं। 

काले पत्थर की मूर्ति

यहां स्थापित मूर्ति की वास्तविक पहचान होने के बाद शोधकर्ता इसे लकुलीश का सबसे बड़ा पंचायतन मंदिर होने का दावा किया जा रहा है। काले पाषाण स्तंभ पर चतुर्भुजी देव रूप में करीब 65 सेमी ऊंचाई व 29 सेमी चौड़ाई वाली यह मूर्ति कत्यूरकालीन महादेव मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग के पास स्थापित है। 

यह है रूप

एक हाथ में लकुट (छड़ी या डंडा) व उध्र्वलिंग की स्थापना इसके लकुलिशी स्वरूप को साफ परिभाषित कर रहा। वहीं मुख्य द्वार के ललाट बिंब (लिंटल) पर वृहद उदर लकुलीश की आकृति उकेरी गई है। संरक्षण के अभाव में खंडित होती जा रही मूर्ति विशालकाय पेड़ों व झाडिय़ों से ढकी पड़ी थी।

बीते रोज जालली घाटी के जोयूं तथा तकुल्टी के ग्रामीणों ने सामूहिक पूजापाठ के लिए सफाई अभियान चलाया तो यह दुर्लभ मूर्ति मिली। शोधकर्ता डा. मोहन चंद्र तिवारी ने इसकी पहचान लकुलीश के रूप में की है।

राजस्थान से उत्तराखंड तक संप्रदाय का प्रभाव

कभी राजस्थान व बाबा जागनाथ की नगरी यानि जागेश्वर धाम (अल्मोड़ा) लकुलीश संप्रदाय की मौजूदगी के लिए प्रसिद्ध था। कई कत्यूरी शासक शिव के इसी स्वरूप के अनुयायी रहे। इन्ही शासकों ने जागेश्वर में लकुलीश मंदिर बनवाया था।

पर करीब सात दशक पूर्व वहां से मूर्ति चोरी होने से लकुलीशीय रूप की पूजा की मान्यता कम होती गई। 90 के दशक में सांस्कृतिक विरासतों व दुर्लभ मूर्तियों के संबंध में यूनेस्को संधि के बाद 1999 में अमेरिका ने जागेश्वरधाम स्थित लकुलीश मूर्ति भारत को सौंपी थी। जो जागेश्वरधाम के संग्रहालय में है।

12वीं सदी की है कलाकृति

द्वाराहाट के तकुल्टी में मिली दुर्लभ मूर्ति 12वीं सदी की मानी जा रही। साफ है कि देवभूमि में लकुलिशी संप्रदाय की जड़ें अतीत में बेहद गहरी रही। शोधकर्ता डा. मोहन चंद्र तिवारी कहते हैं लकुलीश की इस चतुर्भुजी मूर्ति के ऊपरी दाए हाथ में शंख व सर्प तथा नीचे का हाथ अभय मुद्रा में है। ऊपरी बाया व निचला हाथ खंडित हो चुका। 

पर ऊपर वाले हाथ में लकुट (डंडा) धारण करते दर्शाया गया है। मुख्य मंदिर के नीचे एक प्राचीन नौला है। इसी के जल से शिवलिंग का जलाभिषेक किया जाता होगा। गर्भगृह में जल निकासी को कत्यूरकाल में बनी नाली है। मुख्य मंदिर के चारों ओर लघु बने हैं। इनमें मूर्ति स्थापित करने वाला स्थान रिक्त है।

लौट गई थी पुरातत्व टीम 

कत्यूरकालीन मंदिर के संरक्षण व मूर्तियों की पहचान को पूर्व में आवाज उठी थी। पुरात्व विभाग की टीम क्षेत्र में पहुंची भी। आम के विशालकाय वृक्ष, झाडिय़ों का घुप जंगल होने पर पेड़ कटवाने की बात कह बैरंग लौट गई थी।

दिल्ली विवि के सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर डॉ मोहन चंद्र तिवारी ने बताया कि पालीपछाऊं परगना के तकुल्टी, सूरे, जालली क्षेत्रों में पहले भी कई मूर्तियां व प्रागैतिहासिक सयंत्र यानि ओखलियां मिल चुकी हैं। 2019 में सुरेग्वेल में एक ही प्रस्तरखंड में विष्णु के वराह व नरसिंह अवतार की मूर्तियां मिली थीं। पूरे क्षेत्र में कई ऐतिहासिक तथ्य छिपे हैं जिनके उजागर होने से कई महत्वपूर्ण खुलासे होंगे।

Edited By: Prashant Mishra