Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    बजेड़ी की औषधियां हैं बेजोड़

    By Edited By:
    Updated: Mon, 31 Oct 2016 08:54 PM (IST)

    मनीष साह, गरमपानी : चिकित्सा विज्ञान ने बेशक नए आयाम स्थापित कर लिये हों, लेकिन वैदिक औषधीय वनों से

    मनीष साह, गरमपानी : चिकित्सा विज्ञान ने बेशक नए आयाम स्थापित कर लिये हों, लेकिन वैदिक औषधीय वनों से घिरे हिमालयी प्रदेश की जड़ी बूटियों एवं वनस्पतियों का कोई सानी नहीं है। बेतालघाट ब्लॉक के बजेड़ी गाव से सटे इलाकों की वनस्पति इसकी बानगी भर है। पत्तियों व जड़ों आदि को पीस कर तैयार किये जाने वाले गोले का लेप टूटी हड्डियों को जोड़ने की अचूक दवा प्लास्टर विधि एवं दर्द निवारक दवाओं से कहीं अधिक कारगर है। कई दशक पूर्व मवेशियों पर इसका सफल प्रयोग कर बाद में इसे वनस्पति चिकित्सा पद्धति में जोड़ दिया गया। नतीजा पहाड़ ही नहीं भाबर व तराई तक से लोग गोला लेने सुदूर गाव तक पहुंचने लगे हैं।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    बहुत कम लोग जानते होंगे कि दुर्घटना या अन्य कारणों से हड्डी टूटने पर उसे जोड़ने की अचूक औषधि पर्वतीय जंगलों में वनस्पति के रूप में मौजूद है। इस खास किस्म की वनस्पति व जड़ों की पहचान आसान नहीं है। मगर बेतालघाट के दुर्गम बजेड़ी गाव के लोगों को इसमें महारत हासिल है। जंगलों से एक विशेष जाति के पेड़ों की पत्तियों व जड़ों को पीस कर तैयार किया गया गोला बडे़ से बड़े फ्रैक्चर को दोबारा जोड़ सकता है।

    नाम न छापने की शर्त पर गोला बनाने वाले कार्की परिवार के जानकारों की मानें तो यह गोला व्यक्ति विशेष के चोटिल स्थान पर सूजन घटाने व दर्द को कम करने का काम भी करता है। दूरदराज के जंगलों से औषधिया एकत्र कर यह गोला बनाया जाता है। शुरुआत में भाबर तराई के कुछ लोगों ने परिचितों की सलाह पर गोले के लेप का इस्तेमाल किया। अब वर्तमान में हल्द्वानी, रामनगर, पिथौरागढ़, रानीखेत, अल्मोड़ा, ऊधमसिंहनगर आदि स्थानों से लोग पहाड़ का दुर्गम सफर तय कर यहा पहुंचने लगे हैं।

    ऐसे लगाते हैं गोले का लेप

    औषधीय वनस्पतियों की पत्तिया आदि को पीसकर गोला बनाते हैं। कुछ ही समय में यह पत्थर जैसा ठोस हो जाता है। जरूरत पर गोले को तोड़कर हल्के गुनगुने पानी के साथ सिल बट्टे पर पीसकर लेप बनाते हैं। फिर टूटी हड्डी वाले स्थान पर लेप लगा सूती कपड़े से बाध दिया जाता है। तीन दिन की अवधि में ही खिंचाव के साथ दर्द कम हो जाता है। चौथे दिन प्लास्टर की तरह बाधी गई पट्टी खोल दी जाती है और टूटी हड्डी जुड़ जाती है ।

    'यह हमारी वैदिक चिकित्सा पद्धति का ही हिस्सा है। सदियों पूर्व ऐसी ही वनस्पति औषधियों के लेप से युद्ध आदि में घायल सैनिकों के उपचार का जिक्त्र मिलता है। इसे आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति कहते हैं। वैज्ञानिक युग में भी यदि बजेड़ी के बाशिदे इस चिकित्सा पद्धति को जिंदा रखे हैं तो सरकार को चाहिये कि उन्हें प्रोत्साहन दे। ऐसी जड़ी बूटियों को संरक्षित किये जाने व शोध की जरूरत है।

    - डॉ. रमेश सिंह बिष्ट, पर्यावरणविद् एवं जड़ी बूटी विशेषज्ञ'