नशे की बीमारी का समय से करा लें इलाज
जागरण संवाददाता, हल्द्वानी : नशा सामाजिक बुराई के साथ ही शारीरिक व मानसिक बीमारी भी है। लगातार गंभीर
जागरण संवाददाता, हल्द्वानी : नशा सामाजिक बुराई के साथ ही शारीरिक व मानसिक बीमारी भी है। लगातार गंभीर हो रही इस इस बीमारी को लेकर लोग लापरवाह हो रहे हैं। खासकर, किशोर व युवा वर्ग। स्कूल जाने की उम्र से ही किशोर तेजी से नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। इस नशे की चपेट में आकर खुद को खोखला कर रहे हैं। इस तरह की स्थिति पूरे कुमाऊं में हैं। मंगलवार को दैनिक जागरण के हैलो डॉक्टर कार्यक्रम में डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय के क्लीनिकल साइक्लॉजिस्ट डॉ. युवराज पंत लोगों के सवालों का जवाब दे रहे थे। वह नशे के कारण, लक्षण, बचाव व उपचार के बारे में बता रहे थे। अधिकांश सवाल ऐसे माता-पिता के थे, जो बच्चों के नशा करने की समस्या से परेशान थे। कुछ महिलाएं भी थी, जिन्होंने अपने पति का नशा छुड़ाने के लिए परामर्श लिया। इसके लिए बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, नैनीताल, हल्द्वानी व ऊधमसिंह नगर से तमाम फोन आए। नशा करने वालों के नाम सार्वजनिक न हों, इसके लिए हम इस बार नाम प्रकाशित नहीं कर रहे हैं।
धीरे-धीरे पड़ जाती है नशे की आदत
छात्र कुछ दोस्तों की संगत या फिर दूसरों को देखकर नशा करने लगते हैं। धीरे-धीरे नशा करना आदत बन जाता है। एक समय ऐसा होता है कि नशा शरीर की जरूरत बन जाता है। छात्र ड्रग एडिक्ट हो जाता है। इसके तमाम दुष्परिणाम झेलने पड़ जाते हैं। कुछ नशा ऐसा होता है, अगर छोड़ना भी चाहें, तो शरीर में तमाम तरह की परेशानियां होने लगती हैं।
नशा छुड़ाने के लिए अपने मन से न दें दवा
अक्सर लोग अपने करीबी का नशा छुड़ाने के लिए अपने मन से दवा दे देते हैं, लेकिन यह दवा कई बार मरीज की मौत का कारण बन जाती है। किडनी खराब हो जाती है। इसलिए यह दवा मनोचिकित्सक के परामर्श से ही लेनी चाहिए। जगह-जगह नशा छुड़ाने के विज्ञापन आते हैं। यह दवा भी नुकसान करती है।
नशे करने वालों की ऐसे करें पहचान
नशा करने वालों में शारीरिक, मानसिक व व्यवहारिक परिवर्तन आने लगते हैं। कुछ तरह के नशे में भूख बहुत कम हो जाती है, तो कुछ में अधिक। आंखों की पुतलियों में परिवर्तन दिखने लगता है। आवाज व बोलने के तरीके में बदलाव। शरीर या तो शिथिल या बहुत अधिक क्रियाशील हो जाता है। चिड़चिड़ापन, गुस्सा, हीनता की भावना, बात-बात में बहस करने की आदत पड़ जाती है।
ऐसे कराएं उपचार
डॉ. पंत ने सलाह दी कि नशा करने वाले मरीज को अस्पताल लाएं। कई बार मरीज अस्पताल जाने को तैयार नहीं होता है, तो माता-पिता या उनके परिवार का कोई करीबी मनोचिकित्सक से मिल सकता है। उन्हें पूरी स्थिति बताने के बाद मनोवैज्ञानिक व मनोचिकित्सक की सलाह पर उपचार शुरू किया जाता है। शुरुआती दौर में मनोवैज्ञानिक परामर्श से बीमारी ठीक हो जाती है, बाद में दवाइयां या भर्ती करने की भी आवश्यकता पड़ती है।
दवा से नशा करने की इच्छा हो जाती है कम
अब तमाम तरह की दवाइयां आ गई हैं। मानसिक रोग विशेषज्ञ के परामर्श पर इन दवाइयों के सेवन करने की नशा करने की इच्छा कम हो जाती है। सही तरीके से उपचार कराने और उचित परामर्श लेने पर नशा पूरी तरह छूट सकता है। डॉ. पंत बताते हैं, अगर व्यक्ति खुद प्रण कर ले कि नशा छोड़ना है, तो बिना दवा के भी नशा छूट सकता है।
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