जागरण संवाददाता, हल्द्वानी : शर्म महसूस होना लाजिमी है, जब नाम के आगे 'चोर' शब्द लग जाए। इसके लिए किसी को दोषी भी नहीं कहा जा सकता, मगर बदलाव की बयार के लिए मुहिम की जरूरत होती है। चोरगलिया का नाम बदलने के लिए जिस एकता का झंडा आज युवाओं ने थामा है, उसकी शुरुआत चार दशक पहले हो चुकी थी। 1978 में उत्तर प्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री प्रताप भैया से विमर्श और जनता की सहमति के बाद आचार्य नरेंद्र देव के नाम पर चोरगलिया का नाम नरेंद्रनगर रखा गया। तत्कालीन उप्र सरकार ने इस नाम पर मंजूरी की मुहर लगाई, पर अंत में ऐसा पेच लगा कि नरेंद्रनगर वापस चोरगलिया में बदल गया।

पेच था टिहरी (गढ़वाल) का जिला मुख्यालय नरेंद्रनगर। चार दशक पुराने अतीत के पन्नों को पलटते हुए इस सच के बारे में हल्द्वानी के जगमोहन रौतेला बताते हैं कि 1977 में आपातकाल के बाद उप्र में जनता पार्टी की सरकार बनी थी और खटीमा से विधायक चुने गए श्रीश चंद। उन्हें सरकार में वन मंत्री का ओहदा भी मिला और 1978 में श्रीश चंद चोरगलिया दौरे पर आए। उनके साथ समाजवादी नेता प्रताप भैया भी थे। प्रताप भैया के माध्यम से चोरगलिया के सामाजिक कार्यकर्ता ध्यान सिंह रौतेला, कामरेड नेता सत्यप्रकाश, सदानंद शर्मा, शंकर दत्त भट्ट, नारायण दत्त जंगी, महेश बेलवाल, महेंद्र सिंह फस्र्वाण, प्रेम बल्लभ बजेठा, खष्टी दत्त बजेठा, सरदार जगीर सिंह, सरदार चरनजीत सिंह गिल आदि ने चोरगलिया का नाम बदलने का प्रस्ताव वन मंत्री के सामने रखा।

इसके बाद स्थानीय लोगों की बैठक में आम सहमति बनी। प्रताप भैया समाजवादी नेता होने के साथ आचार्य नरेंद्र देव से काफी प्रभावित थे और नरेंद्र देव शिक्षा निधि के नाम से कई स्थानों पर शिक्षण संस्थान भी चला रहे थे। इसलिए उनके सुझाव पर चोरगलिया का नाम नरेंद्रनगर रखने का फैसला लिया गया।

जगमोहन रौतेला ने बताया कि वन मंत्री ने श्रीश चंद इस प्रस्ताव को स्वीकार किया। चोरगलिया के नाम से कोई राजस्व गांव नहीं है, इसलिए नाम परिवर्तन को उत्तर प्रदेश सरकार ने मंजूर कर लिया। फिर कई महीनों तक गांवों में जागरुकता अभियान चलाया गया और लोगों से अपील की गई कि वे पत्राचार में नरेंद्रनगर लिखें। बाजार और कई स्थानों पर नाम परिवर्तन के बोर्ड भी लगाए गए। हल्द्वानी के मुख्य डाकघर को इस बारे में लिखित सूचना दी गई। बाद में पता चला कि टिहरी का जिला मुख्यालय नरेंद्रनगर होने से कई बार चिट्ठियां सीधे वहां चली जाती हैं और फिर लौटकर चोरगलिया पहुंचती हैं। इस कारण पत्राचार में लोगों को नरेंद्रनगर के साथ चोरगलिया भी लिखना पड़ता था। यही एक वजह बनी कि लोगों ने नरेंद्रनगर लिखना छोड़ दिया और चोरगलिया फिर अस्तित्व में आ गया।