जागरण संवाददाता, नैनीताल : मकर संक्रांति पर आयोजित घुघतिया त्यार कुमाऊं का लोक पर्व है। अब अन्य पर्वो की तरह इस पर्व पर कुमाऊं की काशी बागेश्वर में सरयू-गोमती तट के साथ ही रानीबाग, पंचेश्वर व शारदा तट पर टनकपुर में मेला लगता है। ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है। इसी दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन, जबकि दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है। मकर संक्रांति देवताओं का प्रात: काल है। इस दिन स्नान, दान, जप, तप, अनुष्ठान व श्राद्ध का अत्यधिक महत्व है। इसी दिन से धार्मिक अनुष्ठानों से संबंधित मंत्रोच्चार में रवि उत्तरायणे जोड़ा जाता है।

------

रानीबाग में होती है जीयारानी की पूजा

कुमाऊं में कत्यूरियों ने करीब ढाई हजार साल से अधिक समय तक शासन किया। मान्यता है कि कत्यूरी वंश के महाराज धामदेव की महारानी जिया हल्द्वानी के रानीबाग स्थित गुफा में विलुप्त हो गई। जिया रानी के नाम से इस स्थान का नाम रानीबाग पड़ा। हर साल मकर संक्रांति पर मेला लगता है और आज भी कत्यूरी वंशज रानीबाग आकर ढोल नगाड़ों व निशान के साथ देवनृत्य कर स्नान को आते हैं।

-----

एतिहासिक महत्व

21 जनवरी 1921 को कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे, कुमाऊं परिषद के हरगोविंद पंत, चिरंजीलाल वर्मा के नेतृत्व में बागेश्वर के सरयू किनारे हजारों लोगों ने कुली बेगार प्रथा का अंत किया।

-----

काले कौव्वा काले, घुघती माला खाले

कुमाऊं में घुघतिया त्यार पर आटे के मीठे पकवान तैयार किए जाते हैं। जबकि बच्चे सुबह से ही काले कौव्वा काले, घुघति माला खा ले..कहकर कौवों को बुलाते हैं। माना जाता है कि कौवों को खिलाया गया पकवान पूर्वजों तक पहुंचता है।

काले कौवा का ले, का ले

घुघती माला खाले

ले कौवा प्वे, मैके दे भलि भलि ज्वे

ले कौवा पूड़ी, मैके दे ठुली-ठुली कड़ी

लै कौवा ढाल, मैके दे सुनौक थाल

ले कौवा तलवार, मैके बणैं दे होशियार

कुली बेगार प्रथा मुक्ति के लिए

काले कौवा काले, ले कौवा घुघु़ति, सबन कै दे कुली बेगार से मुक्ति।

संस्कृति कर्मी बृजमोहन जोशी के अनुसार घुघतिया त्यार को लेकर कई मान्यताएं हैं। एक मान्यता के अनुसार कुमाऊं में चंद शासक कल्याण चंद की कोई संतान नहीं थी। भगवान बागनाथ की कृपा से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिसका नाम निर्भय चंद था। मां उसे घुघुती नाम से पुकारती थीं। उसके गले में रत्नजडि़त मोतियों की माला थी, जो निर्भय चंद को पसंद थी। जब भी वो रोता भोन नहीं करता तो मां कहती कि तेरी माला कौवों को दे दूंगी। आ कौवा आ कहकर पुकारने लगती को घुघुती खुश हो जाता। पुकारने पर कौवे आने लगे तो उनकी दोस्ती घुघुती से हो गई। राजा का मंत्री राज्य हड़पना चाहता था तो उसने घुघुती का अपहरण कर लिया, कौवों ने उसे देख लिया और घुघुती के गले से मोती की माला लेकर राजा के पास आ गए। कौवों की सहायता से मंत्री को पकड़कर मृत्यु दंड दिया गया। तभी से राजा-रानी कौवों को मीठे आटे के पकवान बनाते थे।

एक यह भी मान्यता

एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार कुमाऊं राजा ज्योतिष ने बताया कि उसकी मौत मकर संक्रांति के दिन उसी के मंत्री हुकुम सिंह के हाथों होगी तो राजा ने साजिश रचकर हुकुम सिंह के छोटे-छोटे टुकड़े कर कौवों को खिला दिए। उसी दिन से राजा की आज्ञानुसार लोग आटे के पकवान बनाकर कौवों को खिलाते हैं। राजा की मौत टलने की खुशी में घुघुतिया त्यार मनाने लगे।