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डिजिटल डकैती ने उत्तराखंड में मचाया कोहराम, पांच साल में 468 करोड़ रुपये की चपत

Published: Thu, 05 Nov 2026 08:54 AM (IST)

उत्तराखंड में पिछले पांच सालों में साइबर ठगों ने लोगों से 468 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की है, जिसमें शिकायतों की संख्या सात गुना बढ़ी है।

इस तस्वीर का उपयोग सांकेतिक रूप में किया गया है।

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जागरण संवाददाता, हरिद्वार। साइबर ठगी अब केवल मोबाइल पर आने वाली फर्जी कॉल या बैंक खाते से रकम उड़ाने तक सीमित नहीं रह गई है। ऑनलाइन निवेश, डिजिटल अरेस्ट और फर्जी बैंकिंग लेनदेन के जरिये लोगों की जीवनभर की कमाई पर सेंध लगाई जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी साइबर ठगी के मामलों में बैंकों की जवाबदेही पर सख्त रुख अपनाया है। सवाल यह है कि जब देश की सर्वोच्च अदालत वित्तीय संस्थानों की लापरवाही पर जवाबदेही तय करने की बात कर रही है, तब उत्तराखंड में साइबर ठगी की स्थिति कितनी गंभीर है।

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से 2025 के बीच उत्तराखंड के लोगों से साइबर ठगों ने 468 करोड़ रुपये से अधिक की रकम ठगी। इस अवधि में करीब 90 हजार शिकायतें दर्ज हुईं।

शिकायतों और ठगी की रकम में लगातार बढ़ोतरी ने पुलिस और बैंकिंग व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। इन आंकड़ों के अनुसार, पांच वर्षों में शिकायतों की संख्या सात गुने से अधिक हो गई। वर्ष 2025 में ठगी की रकम में तेज उछाल आया। आंकड़े बताते हैं कि साइबर अपराधियों के तरीके और उनके निशाने पर आने वाले लोगों की संख्या दोनों बढ़ रहे हैं।

70 करोड़ रुपये से अधिक बचाए

ठगी की रकम के मुकाबले पुलिस की कार्रवाई से बचाई गई रकम भी महत्वपूर्ण है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में 1.21 करोड़, 2022 में 2.45 करोड़, 2023 में 7.41 करोड़, 2024 में 30.17 करोड़ और 2025 में 28.59 करोड़ रुपये बचाए गए। यानी पांच वर्षों में कुल करीब 69.83 करोड़ रुपये बचाए जाने का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि, बचाई गई रकम और पीड़ितों को वास्तव में वापस मिली रकम अलग-अलग हो सकती हैं।

ऑनलाइन निवेश और डिजिटल अरेस्ट का जाल

साइबर ठगी के बदलते तरीकों में ऑनलाइन ट्रेडिंग के नाम पर निवेश कराने और डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर रकम ऐंठने जैसे मामले प्रमुखता से सामने आए हैं। वर्ष 2025 के उपलब्ध विवरण में ऑनलाइन ट्रेडिंग के 60 और डिजिटल अरेस्ट के 18 मामले दर्ज किए गए। फर्जी कॉल, एसएमएस और वर्क फ्रॉम होम के नाम पर ठगी भी जारी रही।

पढ़े-लिखे बन रहे शिकार

इन अपराधों का शिकार केवल कम पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं। उत्तराखंड में सेवानिवृत्त प्रोफेसर जैसे उच्चशिक्षित लोग भी डिजिटल अरेस्ट के झांसे में लाखों-करोड़ों रुपये गंवा चुके हैं। ठग पुलिस, जांच एजेंसी या बैंक अधिकारी बनकर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हैं और पीड़ित को अपनी रकम स्थानांतरित करने के लिए मजबूर करते हैं।

हेल्पलाइन पर तुरंत करें शिकायत

उत्तराखंड में चुनौती केवल ठगों को गिरफ्तार करने की नहीं, बल्कि समय रहते संदिग्ध खातों में रकम रोकने और पीड़ितों को पैसा वापस दिलाने की भी है।

साइबर ठगी होने पर तत्काल 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत करना और राष्ट्रीय पोर्टल cybercrime.gov.in,पर रिपोर्ट दर्ज करना महत्वपूर्ण है। रकम ट्रांसफर होने के शुरुआती समय में शिकायत करने से उसे रोकने की संभावना बढ़ सकती है।

वर्ष शिकायतें ठगी की रकम

  • 2021 - 4,492 - 15 करोड़ रुपये
  • 2022 - 11,169 - 40 करोड़ रुपये
  • 2023 - 18,020 - 69 करोड़ रुपये
  • 2024 - 23,801 - 167 करोड़ रुपये
  • 2025 - 31,870 - 177.81 करोड़ रुपये

ठगी से बचने में बैंकों की अहम सलाह

  • ओटीपी और पिन किसी को न बताएं।
  • अनजान लिंक पर क्लिक न करें।
  • पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य जांच एजेंसी के नाम से धमकी पर भरोसा न करें।
  • अनजान क्यूआर कोड स्कैन न करें।
  • अनावश्यक ऐप डाउनलोड न करें।
  • खाते में होने वाले हर लेनदेन का एसएमएस और ई-मेल अलर्ट सक्रिय रखें।
  • नेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग के पासवर्ड अलग-अलग रखें और समय-समय पर बदलें।
  • कम समय में दोगुना पैसा, गारंटीड रिटर्न और फर्जी ट्रेडिंग ऐप के झांसे में आकर निवेश न करें।

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