जागरण संवाददाता, हरिद्वार। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे श्रीमहंत नरेंद्र गिरि के बारे में धर्मनगरी हरिद्वार के वरिष्ठ संतों की धारणा है कि वह शांत चित्त, धीर-गंभीर, दृढ़ निश्चयी और मजबूत दिल वाले उच्च कोटि के सरल हृदय संत थे। वह सहज ही किसी पर भी विश्वास कर लेते थे। इसका तमाम लोगों ने फायदा उठाया और उन्हें कई तरह की मुसीबत में भी फंसाया। हालांकि, अपने सच्चे व्यक्तित्व के कारण वह हर समस्या से पार पा लेते थे। हालांकि, यही खूबी उनकी जान की दुश्मन भी बन गई।

कनखल स्थित हरिहर आश्रम के पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि कहते हैं कि श्रीमहंत नरेंद्र गिरि विराट हृदय के स्वामी और उच्च कोटि के संत थे। उन्होंने स्वत:स्फूर्त प्रेरणा से संन्यास ग्रहण किया था, न कि किसी से प्रभावित या प्रेरित होकर। कहा कि श्रीमहंत नरेंद्र गिरि आमतौर पर शांत चित्त के स्वामी थे, लेकिन उन्हें किसी भी स्तर पर गलती या गंदगी बर्दाश्त नहीं थी। धर्म और स्वाभिमान की भावना उनमें कूट-कूटकर भरी थी। तुलसी मानस मंदिर के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुन पुरी कहते हैं कि उन्होंने श्रीमहंत नरेंद्र गिरि को अपने सामने धर्म जगत में पलते-बढ़ने के साथ ही अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पद तक पहुंचते देखा। वह दृढ़ निश्चयी मजबूत दिल वाले संत थे।

महामंडलेश्वर हरिचेतनानंद ने कहा कि श्रीमहंत नरेंद्र गिरि किसी दबाव में आने वाले व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने अपना सारा जीवन धर्म-आस्था को बढ़ावा देने में बिताया। वह हमेशा इस बात के हिमायती रहे कि सनातन धर्म ने जुड़े धार्मिक स्थलों की हर व्यवस्था चाक-चौबंद और साफ-सुथरी होनी चाहिए। ताकि वहां आने वाला हर श्रद्धालु ईश्वर में ध्यान लगा सके। महामंडलेश्वर पायलेट बाबा ने कहा कि श्रीमहंत नरेंद्र गिरि इस बात के हिमायती थे कि धर्म के साथ किसी भी स्तर पर समझौता नहीं होना चाहिए। उन्होंने कभी किसी भी स्तर पर अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया।

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Edited By: Sunil Negi