GDP की तरह क्या है GEP? जिसे जारी करने वाला उत्तराखंड पहला राज्य बना, आखिर कैसे होती है इसकी गणना?
डॉक्टर जोशी बताते हैं कि जाहिर है कि जीईपी से अर्थव्यवस्था में आमूलचूल असर पड़ेगा। अगर आप हर वर्ष गंभीरता से ये जान रहे हैं कि पारिस्थितिकी कहां खड़ी तो उसके संरक्षण को प्रभावी कदम उठा सकते हैं। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। बेहतर पारिस्थितिकी का मतलब है कि आर्थिकी साथ-साथ उभरी है। क्योंकि पूरी अर्थव्यवस्था पारिस्थितिकी का ही दोहन उपयोग करती है।

समान नागरिक संहिता कानून की पहल के बाद मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड अब जीडीपी के समानांतर जीईपी (ग्रास एन्वायरनमेंट प्रोडक्ट) लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। इसके साथ ही नवोन्मेष की दृष्टि से उत्तराखंड अनूठे राज्यों में शामिल हुआ है।
वैश्विक स्तर पर नजर दौड़ाएं तो सभी देश व राज्य अपनी जीडीपी (ग्रास डेवपलमेंट प्रोडक्ट) पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन उत्तराखंड ने जीडीपी के साथ पर्यावरण की चिंता करते हुए इसके चार प्रमुख घटकों हवा, मिट्टी, पानी व जंगल को समाहित कर जीईपी सूचकांक जारी किया है।
यद्यपि, इसमें समय लगा, लेकिन अब यह हर वर्ष जारी होगा। इससे पता चल सकेगा कि हवा, पानी, मिट्टी व जंगल के संरक्षण के लिए हमने क्या-क्या किया और इसके क्या परिणाम रहे। जीईपी की अवधारणा और फिर इसके सूचकांक का फार्मूला तैयार करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही ख्यातनाम पर्यावरणविद् और हिमालयन एन्वायरनमेंटल स्टडीज एंड कंजर्वेशन आर्गनाइजेशन (हेस्को) के संस्थापक पद्मभूषण डा अनिल प्रकाश जोशी की।
उनके प्रयासों को उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने स्वीकारा और जीईपी लागू करने का निर्णय लिया। उनका कहना है कि हमें विकास चाहिए और बेहतर पर्यावरण भी, इसका रास्ता जीईपी में छिपा है। दैनिक जागरण के वरिष्ठ संवाददाता केदार दत्त ने जीईपी से जुड़े तमाम बिंदुओं पर डॉ जोशी से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं इसके मुख्य अंश
सवाल : जीडीपी के साथ जीईपी की आवश्यकता क्यों महसूस की गई?
देखिये, ऐसा है कि दो-तीन सौ वर्ष पहले जब विश्व आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था, तब दो आधार थे, पहला खेती-बाड़ी और दूसरा घर-बार। इसमें ही विश्व के लोग जीते थे। रोजगार, आर्थिक उन्नयन की बात नहीं होती थी। आर्थिकी तो मुगलकाल से लेकर आज तक सबसे बड़ा फैक्टर रही है।
आर्थिकी की भूमिका तब भी थी, लेकिन उसे बेहतर बनाने को ब्रिटेन से शुरू हुई औद्योगिक क्रांति विश्वभर में फैली। उसी दौरान बड़ी बात यह भी हुई कि अर्थव्यवस्था को किस तरह मजबूत किया जाए, इसके लिए खेती-बाड़ी, ढांचागत विकास, रोजगार व औद्योगिक विकास को केंद्र में रख जीडीपी की कल्पना की गई।
सौ-डेढ़ सौ साल की यात्रा में अर्थव्यवस्था के इन चार हिस्सों में से उद्योगों व ढांचागत विकास ने सबको पीछे छोड़ दिया, विशेषकर खेती बाड़ी को। आज विश्व के गिने-चुने देश ही ऐसे हैं, जिन्हें खेती बाड़ी से 10-12 प्रतिशत की आय हो रही है। साफ है कि इस दौड़ का पूरा भार प्रकृति पर पड़ा। कोई भी उद्योग या कार्य ऐसा नहीं है, जिसमें प्रकृति का दोहन या उपयोग न हुआ हो।
एक समय तक संतुलन बना रहा, लेकिन वर्ष 1960-70 के बाद धीरे-धीरे प्रकृति के हालात गंभीर होते चले गए। इसके बाद स्टाकहोम की बैठक हो अथवा काप का जन्म, तमाम स्तरों पर चिंता तो जताई गई, लेकिन इसे लेकर कोई व्यवहारिक उत्तर निकलकर नहीं आया। कारण यह कि सबकी दौड़ जीडीपी बढ़ाने की थी।
यह नहीं सोचा गया कि पारिस्थितिकी के हिसाब से हम कहां खड़े हैं। इसे संभालने व बढ़ाने को क्या कर रहे हैं। इसकी अनदेखी का नतीजा प्राणवायु, जल समेत तमाम तरह के संकट के रूप में सामने आया। इस सबको देखते पारिस्थितिकी के संरक्षण के लिए जीईपी की आवश्यकता समझी गई।
सवाल : जीईपी क्या है और इसे यह नाम क्यों दिया गया?
वनों के संरक्षण के लिए विश्व के सभी देशों में वन विभाग है। पर्यावरण सूचकांक निकालने वाला एक्यूआइ है। मिट्टी के हालात बताने वाली भी संस्था है। इस सबके बावजूद यह नहीं सोचा गया कि हम हवा, मिट्टी, जंगल और पानी का आकलन करें। यदि नहीं करें तो कम से कम एक साथ जोड़कर बताएं कि एक वर्ष में हमने इनके लिए क्या किया।
सरकारें भी नहीं बताना चाहती कि इन मुद्दों पर अकाउंट क्या रहे। ऐसे में हमने तय किया कि जीडीपी के समानांतर इसके आकलन का मानक होना चाहिए। इसे नाम दिया गया गया जीईपी।
जीडीपी में विकास है, जबकि जीईपी में पर्यावरण। यदि हम जीईपी सूचकांक का दूसरा नाम रखते तो यह जल्दी से जुबां पर नहीं चढ़ता। इसमें पर्यावरण की चिंता और समझ है, जिसकी सबसे बड़ी आवश्यकता है। यानी, हम विकास के साथ पर्यावरण के संरक्षण को क्या-क्या कर रहे हैं, यही जीईपी है।
सवाल : जीईपी सूचकांक और इसे उत्तराखंड सरकार के स्वीकारने तक के सफर पर रोशनी डालेंगे?
दरअसल, 12-14 साल पहले जीईपी की कल्पना की गई, इसे लेकर लंबा मंथन चला। तब एक रास्ता था कि सरकार के पास जाएं, सरकारों ने हामी भी भरी। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद सरकारों का दायित्व हो गया कि वे प्रकृति के बारे में अपनी चिंता बताएं।
वर्ष 2014-15 में जीईपी के बारे में गहनता से सोचना प्रारंभ किया गया। तब सरकार के मुखिया बदल गए। बाद में फिर से प्रयास किए गए, क्योंकि सरकार कह चुकी थी कि इसे स्वीकारेंगे। कोर्ट में भी सरकार ने कहा कि जीईपी सूचकांक बना रहे हैं।
अब सरकार के साथ ही मेरे सामने भी चुनौती थी कि सूचकांक कैसे तैयार किया जाए। यह ऐसा होना चाहिए, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता हो। फिर हमने सरकार के साथ ही विभिन्न संस्थाओं से भी बात की। दुर्भाग्य से हम पश्चिम का अनुसरण करते हैं। पश्चिम में ईको सिस्टम सर्विस शब्द चला था।
संस्थानों के लोग भी इसी तर्ज पर चलने लगे। इसका प्रतिवाद करते हुए मैंने साफ किया कि सालभर में कितने जंगल बढ़े, कितना पानी बढ़ाया, कितनी मिट्टी बेहतर की, हमें इसका सूचकांक चाहिए। जब चारों ओर से निराशा हाथ लगी तो हमने स्वयं के स्तर पर काम करने का निर्णय लिया। एक डेढ़ साल बाद एक इक्वेशन ने जन्म लिया।
मेरे पुत्र शिवम जोशी ने अहम भूमिका निभाई। फिर हमने इसे कुछ अंतरराष्ट्रीय जर्नल को भेजा। इकोलाजिकल इंडिकेटर ने इसे छापा, जो वैश्विक स्तर पर नामी जर्नल है। डाउन टू अर्थ ने भी इसे प्रकाशित किया। अब हमें अंतरराष्ट्रीय मान्यता के दो मजबूत आधार मिल चुके थे। फिर हमने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बात की।
यह तय हुआ कि हमें चार विभागों से आंकड़े चाहिए। किसी तरह से आंकड़े आए। तब यह भी समझ आया कि फार्मेट कैसा होना चाहिए। जब हमने आंकड़ों का विश्लेषण किया तो जीईपी सूचकांक निकलकर सामने आया। सरकार ने इसे स्वीकारा और हाल में जीईपी सूचकांक को जारी किया।
जीईपी सूचकांक निकालने का फार्मूला क्या है?
देखिये, हमने सरल तरीका अपनाया। उदाहरण के तौर पर जंगल को लेते हैं। हमने वन विभाग से पूछा कि आपने कितने पौधे लगाए। जवाब मिला कि वर्ष 2021-22 में 21 लाख पौधे लगाए। हर पेड़ की वेल्यू अलग-अलग होती है। पारिस्थितिकी नियम के अनुसार जो सबसे बेहतर पेड़ होते हैं, उन्हें क्लाइमेटिक ट्री कहा जाता है। मतलब वे अंत में आते हैं। जब परिस्थितियां ठीक होंगी तो वे आएंगे।
क्लाइमेटिक क्लाइमेक्स भी एक शब्द होता है। विभाग ने पौधारोपण के जो आंकड़े दिए, उसे तीन श्रेणियों में रखा गया। नंबर तीन पर सबसे बेहतर, दो में मध्यम और एक में सबसे निम्न वृक्ष प्रजातियों को रखा गया। इनमें आर्थिक नहीं इकोलाजिकल वेल्यू ली गई। संख्या मिलने पर इसे गुणा किया और फिर 77 से भाग दिया, क्योंकि इतनी प्रजातियां थी।
ऐसे में ट्री वेटेज आया। पौधे साढ़े चार लाख हो गए। इसका भी पांच प्रतिशत सरवाइवल लिया गया। यह 23 हजार पेड़ आया। तब छह हजार पेड़ कटे थे, जिन्हें इसमें घटा दिया और 17000 ट्री वेटेज आया। इसी तरह हवा, मिट्टी व पानी के आंकड़ों के आधार पर इनके अलग-अलग सूचकांक निकाले गए और फिर इन सभी को जोड़कर जो योग प्राप्त हुआ, उसे राज्य का जीईपी सूचकांक कहा गया।
सवाल : आज आर्थिकी व पारिस्थितिकी के मध्य समन्वय पर जोर दिया जा रहा है, क्या इसका रास्ता जीईपी से निकलेगा?
जी हां, बिल्कुल। जीईपी की तीन विशिष्ट बाते हैं। एक तो उत्तराखंड विश्व का पहला राज्य है जो जीडीपी के साथ पारिस्थितिकी का ब्योरा भी दे रहा है। जीईपी के लिए विश्व में एक सूचक आ गया है।
यह भी बड़ी बात है, जिसे ज्यादा समझा जाना चाहिए वह यह कि मनुष्य भोगने के लिए तो आगे रहता है, लेकिन जोडऩे की दिशा में भी आगे आए। वर्तमान परिस्थितियों में हमें विकास भी चाहिए और बेहतर पर्यावरण भी। स्वाभाविक रूप से इसका रास्ता जीईपी में छिपा है।
सवाल : जीईपी सूचकांक का फार्मूला आने के बाद मन में कोई आशंका या भय था?
जब जीईपी से संबंधित इक्वेशन अंतरराष्ट्रीय जनरल में छपी तो इसे लेकर विश्व के अनेक देशों में चर्चा हुई। वो भारत को यह श्रेय देते ही नहीं कि वह जीईपी का पहला ग्रोथ मेजर लेकर आ रहा है।
दूसरा भय यह भी था कि कहीं इसमें चीन न कूद जाए। इसीलिए हम चाहते थे कि उत्तराखंड जीईपी लागू करने वाला पहला राज्य बने और सरकार से इसे जल्दी रिलीज करने को कहा। हम भारत व उत्तराखंड को इस श्रेय से वंचित नहीं करना चाहते थे। इसमें सफलता मिली है।
सवाल : तो क्या हमने प्रकृति को भी अर्थ समझना शुरू कर दिया है?
जिस तरह से हम प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं, उसे देखते हुए अब समय आ गया है कि प्रकृति को भी अर्थ यानी पैसा ही समझना पड़ेगा। आपके हाथ में रुपया तो है, लेकिन पीने के लिए पानी खरीदना पड़ रहा है। यानी पैसा और पानी दोनों बराबर महत्व के हो गए हैं। आप ठंडी हवा खाने को एसी लेना चाहते हैं।
प्रकृति के उत्पाद पैसों में झलकने लगे हैं। अब जबकि ऐसी स्थिति है तो प्रकृति के उत्पादों को जितना बेहतर करेंगे, आपका दबाव उस आर्थिकी में नहीं होगा, जो आज की तारीख में है। आप देखिये, इस बार गर्मी में कितने कूलर, एसी बिके। अगर मौसम ठीक रहता तो इस बार एसी कूलर क्यों ज्यादा बिकते।
सवाल : उत्तराखंड सरकार ने जीईपी के लिए प्रकोष्ठ बनाने की बात कही है, इस पर आपका क्या कहना है?
उत्तर: मुख्यमंत्री धामी ने प्रकोष्ठ बनाने की बात कही है, लेकिन मेरा तो सुझाव है कि यह कार्य धरातलीय आधार पर तीसरे पक्ष के माध्यम से हो। यद्यपि, राज्य में इस साल हवा, पानी, मिट्टी व जंगल को लेकर जिस तरह से काम हो रहा है, उससे अगले वर्ष जीईपी बेहतर रहने की उम्मीद है।
मैं मुख्यमंत्री धामी को धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने जीईपी के महत्व को समझा और लागू किया। इस श्रेय के वह पूरे हकदार हैं। यहां एक बात और, हम जीडीपी पर प्रश्न खड़े नहीं करते, लेकिन जीईपी पर कर सकते हैं, क्योंकि हवा, मिट्टी, पानी व जंगल सबको चाहिए। सभी सरकार से पूछ सकते हैं कि इनके संरक्षण को उसने क्या किया।
सवाल : क्या जीईपी के लिए देश के अन्य राज्यों ने भी संपर्क किया है?
उत्तर: अभी मध्य प्रदेश व बिहार के संपर्क में हूं, जहां जीईपी की बात हो रही है। मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जीईपी का वादा किया था। इस बारे में अब मुख्यमंत्री मोहन यादव से बात हुई है।
बिहार के जल मंत्री से भी बात हुई है और मैं शीघ्र ही बिहार जाऊंगा। मैं व्यक्तिगत रूप से समझता हूं कि यह बड़ी सेवा है, जिसे मैं दूंगा। अब तो उद्योग जगत ने भी जीईपी की पहल को सराहा है। वे भी बताएंगे कि जीईपी के लिए क्या-क्या कर रहे हैं।
सवाल : जीईपी की मुहिम को गति देने के लिए आगे की योजना क्या है?
आने वाले दिनों में जीईपी को लेकर देश में जनजागरण यात्रा की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। इस दौरान प्रबुद्धजनों, राजनीतिज्ञों समेत अन्य जनों के साथ जीईपी को लेकर चर्चा की जाएगी। अब इस मुहिम को तेजी से विस्तार दिया जाएगा।
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